गढ़वा थाना बना ‘फिक्स पोस्टिंग’ का अड्डा? कुर्सी से चिपके या सिस्टम फेल? अजीत उपाध्याय की तैनाती पर बवाल
गढ़वा थाना बना ‘फिक्स पोस्टिंग’ का अड्डा? कुर्सी से चिपके या सिस्टम फेल? अजीत उपाध्याय

सिंगरौली | गढ़वा | अजय शर्मा
मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले के गढ़वा थाना इन दिनों एक पुलिसकर्मी को लेकर सुर्खियों में है। नाम है — अजीत उपाध्याय। बीते 4 वर्षों से अधिक समय से एक ही थाने में जमे इस पुलिसकर्मी को लेकर अब सवाल खड़े होने लगे हैं सूत्र बताते हैं कि अजीत उपाध्याय को इस दौरान कई बार लाइन अटैच भी किया गया, लेकिन हर बार कुछ समय बाद उनकी वापसी फिर से गढ़वा थाना में ही हो जाती है। यही वजह है कि अब यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर ऐसा क्या है गढ़वा में, जो उन्हें बार-बार यहीं खींच लाता है?
सिस्टम पर सवाल, जांच की मांग तेज
स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि सिर्फ अजीत उपाध्याय ही नहीं, बल्कि कई ऐसे आरक्षक और उप निरीक्षक हैं जो वर्षों से एक ही थाने या चौकी में “मनचाही पोस्टिंग” का लाभ उठा रहे हैं। यदि इस पूरे मामले की निष्पक्ष और गहराई से जांच हो, तो कई नाम सामने आ सकते हैं।
गंभीर आरोपों ने बढ़ाई हलचल?
सूत्रों के अनुसार, अजीत उपाध्याय पर अवैध गतिविधियों को बढ़ावा देने और स्थानीय माफियाओं से करीबी संबंध रखने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए जा रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि क्षेत्र में चल रही अवैध गतिविधियों से उन्हें आर्थिक लाभ मिलता है, जो उन्हें गढ़वा में टिके रहने के लिए प्रेरित करता है।
हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है, लेकिन चर्चाओं ने पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
अब गेंद एसपी के पाले में?
सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि जिले के पुलिस अधीक्षक (SP) इस मामले में क्या कदम उठाते हैं—
क्या अजीत उपाध्याय को फिर से लाइन अटैच किया जाएगा?
क्या उनका ट्रांसफर किसी अन्य थाने में होगा? या फिर वे गढ़वा थाना में ही जमे रहेंगे?
पारदर्शिता ही समाधान
इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि पुलिस विभाग में ट्रांसफर-पोस्टिंग सिस्टम की पारदर्शिता बेहद जरूरी है। एक ही जगह वर्षों तक जमे रहना न सिर्फ व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है, बल्कि कानून-व्यवस्था की निष्पक्षता पर भी असर डालता है।
👉 अब देखना होगा कि प्रशासन इस पर क्या रुख अपनाता है—कार्रवाई या फिर एक और “अनदेखी”?













