कटनी पिपरौध में आदिवासी जमीन पर ‘कानूनी डकैती’! कौड़ियों के दाम सौदा, फर्जी नामांतरण से डोडानी तक पहुंची जमीन—पटवारी-तहसीलदार की भूमिका कटघरे में”
“कटनी पिपरौध में आदिवासी जमीन पर ‘कानूनी डकैती’! कौड़ियों के दाम सौदा, फर्जी नामांतरण से डोडानी तक पहुंची जमीन—पटवारी-तहसीलदार की भूमिका कटघरे में”

कटनी | मनोज सिंह परिहार
कटनी जिले के पिपरौध क्षेत्र में आदिवासियों की करोड़ों रुपये मूल्य की जमीन को हड़पने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। आरोप है कि पूरे खेल को वैध दिखाने के लिए राजस्व विभाग ने कानून की आड़ में ऐसा “तर्कों का जाल” बुना, जिससे असल सच्चाई दबा दी गई। अब इस प्रकरण में पटवारी और तहसीलदार की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
‘बंटवारा’ या सुनियोजित साजिश?
जांच में सामने आया है कि तहसील कार्यालय ने यह तर्क दिया कि आदिवासी मां से बेटे (जो गैर-आदिवासी/पटेल के रूप में दर्ज) को जमीन मिलना केवल “पारिवारिक बंटवारा (धारा 178-क)” है, न कि कोई क्रय-विक्रय या विनिमय।
इसी आधार पर बिना कलेक्टर की अनुमति के जमीन का नामांतरण कर दिया गया
लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग बताई जा रही है। स्थानीय लोगों के अनुसार यह “बंटवारा” सिर्फ एक कानूनी ढाल था, जिसके जरिए जमीन को आदिवासी से निकालकर आगे गैर-आदिवासी हाथों तक पहुंचाने का रास्ता तैयार किया गया।
कैसे बदला मालिकाना हक? पूरा खेल समझिए
पहले आदिवासी परिवारों से जमीन बेहद कम कीमत में ली गई
फिर “पारिवारिक बंटवारा” दिखाकर बेटे के नाम नामांतरण कराया गया
इसके बाद उसी जमीन को कथित रूप से डोडानी परिवार को बेच दिया गया
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मूल रिकॉर्ड में जमीन आदिवासी की थी, तो गैर-आदिवासी को बेचते समय कलेक्टर की अनुमति क्यों नहीं ली गई?
मूल रिकॉर्ड की अनदेखी, कानून पर सवाल
कानूनी प्रावधानों के अनुसार यदि ‘मिशल बंदोबस्त’ या मूल रिकॉर्ड में जमीन आदिवासी दर्ज है, तो उसका स्टेटस नहीं बदला जा सकता।
चाहे वारिस किसी भी जाति/वर्ग का हो, जमीन ‘अहस्तांतरणीय’ श्रेणी में ही रहती है।
इसके बावजूद नामांतरण और बिक्री की प्रक्रिया पूरी होना, राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
‘फाइल गायब’—सबूत मिटाने की कोशिश?
मामले की शिकायत जनसुनवाई में होने के बाद तहसीलदार द्वारा एसडीएम से मार्गदर्शन मांगा गया था।
लेकिन जैसे-जैसे मामला आगे बढ़ा, शिकायत से जुड़ी मूल फाइल ही गायब हो गई।
अंतिम आदेश में न तो वरिष्ठ अधिकारियों की आपत्तियों का जिक्र
न ही ‘क्रय-विक्रय’ को अवैध बताने वाली टिप्पणियों का उल्लेख
यह पूरा घटनाक्रम संदेह को और गहरा करता है।
राजनीतिक संरक्षण के आरोप
स्थानीय लोगों का दावा है कि इस पूरे मामले में एक रसूखदार नेता की भूमिका सामने आ रही है, जिन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए आदिवासी परिवारों की जमीन को व्यवस्थित तरीके से अपने कब्जे में लिया।
आरोप है कि परिवार के ही एक सदस्य के आदिवासी होने का फायदा उठाकर इस पूरे “कानूनी खेल” को अंजाम दिया गया।
कानूनी धाराएं जो लागू हो सकती हैं
इस मामले में कई गंभीर कानूनों के उल्लंघन की आशंका जताई जा रही है, जैसे—
मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 (आदिवासी भूमि संरक्षण)
अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989
भारतीय दंड संहिता की धाराएं 420, 467, 468, 471 (धोखाधड़ी व जालसाजी)
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988
जनता के सवाल, प्रशासन पर दबाव
क्या आदिवासियों की जमीनें यूं ही प्रभावशाली लोगों के कब्जे में जाती रहेंगी?
क्या राजस्व विभाग निष्पक्ष है या मिलीभगत में शामिल?
क्या जिला प्रशासन इस मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच कराएगा?
लोगों की मांग
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि—
पूरे प्रकरण की न्यायिक जांच (ज्यूडिशियल इंक्वायरी) कराई जाए
दोषी अधिकारियों और संबंधित व्यक्तियों पर तत्काल एफआईआर दर्ज हो
आदिवासी परिवारों को उनकी जमीन वापस दिलाई जाए
अब कार्रवाई या फिर फाइलों में दफन होगा सच?
पिपरौध का यह मामला सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि आदिवासियों के अधिकार और न्याय की लड़ाई का प्रतीक बन चुका है।
अब सबकी नजर जिला प्रशासन पर टिकी है कि वह इस “कानूनी खेल” का सच सामने लाता है या फिर यह मामला भी सिस्टम की चुप्पी में दबकर रह जाएगा।












