5 साल से जमे आरटीओ, सड़कें माफियाओं के हवाले — सिंगरौली
आरटीओ कार्यालय के सामने से गुजरती मौत — राखड़-कोयला हाईवा बेलगाम, RTO प्रशासन मौन

सिंगरौली अजय शर्मा / भूपेंद्र पाण्डेय
सिंगरौली। जिला आज जिस अराजक यातायात, बेलगाम भारी वाहनों और लगातार हो रहे सड़क हादसों से जूझ रहा है, उसके पीछे सिर्फ ट्रांसपोर्ट माफिया ही नहीं बल्कि जिला परिवहन विभाग की चुप्पी और संरक्षण भी उतनी ही जिम्मेदार दिखाई दे रही है। इस पूरे तंत्र का चेहरा बन चुके हैं—जिला परिवहन अधिकारी विक्रम सिंह राठौर 5–6 साल एक ही कुर्सी, फिर भी जवाबदेही शून्य आरटीओ विक्रम सिंह राठौर लगभग 5 से 6 वर्षों से सिंगरौली में पदस्थ हैं। नियमानुसार जब उनका कार्यकाल पूरा हुआ और शासन ने उन्हें अन्य जिले में स्थानांतरित किया, तब एक ईमानदार अधिकारी की तरह आदेश स्वीकार करने के बजाय उन्होंने हाईकोर्ट जाकर स्टे ले लिया और दोबारा सिंगरौली में कुर्सी संभाल ली।
यहां सबसे बड़ा सवाल उठता है—
👉 क्या किसी जिले से इतना मोह ईमानदारी की पहचान है?
👉 यदि अधिकारी निष्कलंक होता, तो ट्रांसफर से इतनी बेचैनी क्यों?
👉 कहीं ऐसा तो नहीं कि सिंगरौली छोड़ने से किसी ‘सिस्टम’ के उजड़ने का डर था?
राखड़ और कोयला माफिया बेलगाम, आरटीओ मौन दर्शक
सिंगरौली की सड़कों पर प्रतिदिन राखड़ और कोयला परिवहन करने वाले हाईवा व ट्रेलर मौत बनकर दौड़ते हैं
खासकर रात्रि 8 बजे से सुबह 8 बजे तक, जिला परिवहन कार्यालय के ठीक सामने से, सार्वजनिक बाईपास मार्ग पर भारी वाहन तेज़ रफ्तार और ओवरलोड होकर गुजरते हैं।
हैरानी की बात यह है कि—
न कोई चेकिंग न कोई पूछताछ न परमिट की जांच न रूट की अनुमति
मानो इन वाहनों को आरटीओ कार्यालय के सामने से गुजरने का मौन लाइसेंस मिल चुका हो।
स्कूल–कॉलेज–जेल वाला रास्ता, फिर भी भारी वाहन बेखौफ
जिस मार्ग से ये भारी वाहन गुजरते हैं, वहां—
जिला परिवहन विभाग कार्यालय
तहसील कार्यालय ,शासकीय व निजी आईटीआई , शासकीय पॉलीटेक्निक कॉलेज ,मॉडल स्कूल ,
जिला जेल जैसी अति संवेदनशील संस्थाएं मौजूद हैं।
छोटे बच्चे, छात्र, महिलाएं, बुजुर्ग और आम नागरिक रोज इसी रास्ते से आवागमन करते हैं, लेकिन आरटीओ साहब को न बच्चों की सुरक्षा दिखती है, न कानून का डर हादसे हुए, घर उजड़े, लेकिन साहब सड़क पर नहीं उतरे अनियंत्रित और तेज़ रफ्तार भारी वाहनों ने सिंगरौली में कई जिंदगियां लील लीं।
कई परिवारों के घर के चिराग बुझ गए, लेकिन सवाल यह है कि—
👉 क्या कभी आरटीओ विक्रम सिंह राठौर ने खुद सड़क पर उतरकर सख्त अभियान चलाया?
स्थानीय लोगों का सीधा आरोप है—
“जानकारी रोज होती है, लेकिन कार्रवाई जानबूझकर नहीं की जाती।
साहब कार्यालय में बैठकर फाइलें देख रहे हैं, सड़कें माफियाओं के हवाले हैं।”
आंदोलन हुआ, जनता भड़की, फिर भी अधिकारी सुरक्षित
आरटीओ विक्रम सिंह राठौर की कार्यशैली के विरोध में बीते समय उग्र आंदोलन भी हुआ।
जनता की एक ही मांग थी—
👉 ऐसे अधिकारी को सिंगरौली से हटाया जाए जो माफियाओं पर लगाम लगाने में विफल रहा।
लेकिन नतीजा क्या निकला?
न तबादला ,न विभागीय जांच ,न कोई जवाबदेही
यह चुप्पी खुद में बहुत कुछ कहती है
प्रश्नों के कटघरे में शासन–प्रशासन
अब सवाल सिर्फ एक अधिकारी का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम का है—
❓ क्या सिंगरौली को ट्रांसपोर्ट माफियाओं के लिए खुला मैदान बना दिया गया है?
❓ क्या आरटीओ की कुर्सी कानून पालन के लिए है या संरक्षण देने के लिए?
❓ क्या हादसों के बाद भी जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं होगी?
सिंगरौली की जनता आज खुद को असहाय, असुरक्षित और ठगा हुआ महसूस कर रही है।
अब देखना यह है कि शासन कब जागता है—
या फिर अगली दुर्घटना का इंतज़ार किया जा रहा है?












