जिला जेल सिंगरौली में बंदियों की मौत, मारपीट, मानवाधिकार उल्लंघन एवं व्यवस्थाओं को लेकर गंभीर प्रश्न — नियम-कानून के दायरे में निष्पक्ष जांच की मांग
जिला जेल सिंगरौली में बंदियों की मौत, मारपीट, मानवाधिकार उल्लंघन एवं व्यवस्थाओं को लेकर गंभीर प्रश्न — नियम-कानून के दायरे में निष्पक्ष जांच की मांग

सिंगरौली। जिला जेल सिंगरौली में पदस्थ जेलर डॉक्टर लक्ष्मीकांत त्रिपाठी, जिनका कार्यकाल लगभग दो या तीन वर्ष पूर्ण हो चुके हैं, के कार्यकाल के दौरान लगभग तीन से चार बंद बंदियों की मौत हो चुकी है। उक्त मामलों को लेकर पीड़ित परिवार द्वारा जिला ट्रामा सेंटर अस्पताल में हंगामा भी किया गया, विरोध भी किया गया। यहां सिर्फ इस बात को रखकर मामले को टाल दिया गया कि मजिस्ट्रियल जांच होगी, जांच उपरांत कार्यवाही होगी परंतु सवाल यह है कि जिस जेलर के कार्यकाल में मौत हो रही है, उस जेलर को यथावत रखकर क्या जांच संभव है? इस पर जवाब अपेक्षित है फिलहाल जेल के अंदर कैदियों के लिए ना सही भोजन की व्यवस्था है, ना ही सही व्यवस्थाएं हैं। आए दिन प्रताड़ित किया जाता है, मारपीट किया जाता है। जेलर साहब की मौजूदगी में मारपीट किया जाता है जब भी मजिस्ट्रेट साहब जेल के अंदर निरीक्षण करते हैं, तो मजिस्ट्रेट साहब के आने से पहले कैदियों को निर्देशित किया जाता है कि किसी ने मुंह खोला तो मजिस्ट्रेट साहब के जाने के बाद अंजाम बुरा होगा। और मजिस्ट्रेट साहब के जाने के बाद कई बार जिन्होंने बोलने का प्रयास किया, उनके साथ मारपीट की गई, प्रताड़ित किया गया कि कैसे मजिस्ट्रेट साहब के सामने मुंह खोलने का प्रयास किया सवाल यह नहीं है कि मारपीट की जा रही है, बल्कि सवाल यह है कि मारपीट क्यों की जा रही है। क्या संविधान में ऐसा उल्लेख है कि जेल के अंदर मारपीट करना संविधान के नियम के अनुरूप है, या फिर जेलर साहब अपने नियम अलग क्यों बना रहे हैं? किसका संरक्षण है, कौन संरक्षित कर रहा — यह जांच का विषय है और जांच होना चाहिए फिलहाल ऐसे जेलर, जिनकी मौजूदगी में मौतें हो रही हैं, और जिनका कार्यकाल दो से तीन वर्ष हो गया है, ऐसे जेलर को यथावत क्यों रखा गया है — यह सबसे बड़ा विषय है। कई अन्य व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठ रहे हैं।
नियम एवं कानून के संदर्भ में गंभीर उल्लंघन
उपरोक्त प्रकरण प्रथम दृष्टया भारत के संविधान एवं विभिन्न विधिक प्रावधानों के संभावित उल्लंघन की ओर संकेत करता है: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 — प्रत्येक व्यक्ति को जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। जेल में बंद व्यक्ति भी इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता
अनुच्छेद 14 — विधि के समक्ष समानता एवं समान संरक्षण का अधिकार सुनिश्चित करता है।
अनुच्छेद 20 एवं 22 — विधिक प्रक्रिया के अंतर्गत संरक्षण एवं मानवाधिकारों की गारंटी देते हैं।
कारागार अधिनियम, 1894 (Prisons Act, 1894) के तहत
बंदियों के साथ अमानवीय व्यवहार, मारपीट एवं प्रताड़ना प्रतिबंधित है
जेल प्रशासन पर बंदियों की सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं मूलभूत सुविधाओं की जिम्मेदारी निर्धारित है।
मॉडल प्रिजन मैनुअल, 2016 के अनुसार
बंदियों को उचित भोजन, चिकित्सा, सुरक्षा एवं सम्मानजनक व्यवहार देना अनिवार्य है।
किसी भी प्रकार की शारीरिक प्रताड़ना, धमकी या दबाव पूर्णतः निषिद्ध है।
भारतीय दंड संहिता (IPC) के प्रासंगिक प्रावधान
धारा 302/304 — संदिग्ध मृत्यु के मामलों में लागू हो सकती हैं
धारा 323/325 — मारपीट एवं चोट पहुंचाने के मामले
धारा 330/331 — प्रताड़ना द्वारा बयान या जानकारी प्राप्त करने के अपराध
धारा 506 — आपराधिक धमकी
मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अंतर्गत
किसी भी व्यक्ति, विशेषकर बंदियों के साथ अमानवीय व्यवहार, मानवाधिकार उल्लंघन की श्रेणी में आता है।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश (कस्टोडियल हिंसा के मामलों में)
हिरासत/जेल में किसी भी प्रकार की हिंसा, प्रताड़ना या मृत्यु को गंभीर अपराध मानते हुए निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जांच आवश्यक बताई गई है
जिस जेलर के कार्यकाल में लगातार मौतें हो रही हैं, उन्हें पद पर बनाए रखकर निष्पक्ष जांच कैसे संभव है?
क्या मजिस्ट्रियल जांच केवल औपचारिकता बनकर रह गई है?
जेल के अंदर मारपीट, धमकी एवं प्रताड़ना किसके संरक्षण में हो रही है?
निष्पक्ष एवं पारदर्शी जांच सुनिश्चित करने हेतु संबंधित जेलर को तत्काल प्रभाव से पद से पृथक किया जाए।
उच्च स्तरीय स्वतंत्र जांच समिति (न्यायिक/विशेष जांच दल) गठित की जाए।
जेल के अंदर की व्यवस्थाओं की व्यापक समीक्षा कर जिम्मेदार अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए।
बंदियों के मानवाधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
यह मामला केवल एक जेल या एक अधिकारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कानून के शासन, मानवाधिकारों की रक्षा एवं प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा गंभीर विषय है। यदि समय रहते इस पर ठोस कार्रवाई नहीं की गई, तो यह स्थिति और अधिक गंभीर रूप ले सकती है अगले अंक में विस्तृत खुलासा किया जाएगा कि जेल के अंदर बंदियों को किस प्रकार खौफनाक परिस्थितियों में जीवन यापन करने के लिए मजबूर किया जाता है













