“हत्या, आगजनी, बवाल… फिर भी जमे जिम्मेदार — आखिर किसका है संरक्षण?”
“सिंगरौली में ‘कानून’ हार गया या बिक गया? मोरवा बना सवालों का सबसे बड़ा अड्डा!”

सिंगरौली: जिला आज हर किसी के जुबान पर है क्यों क्योंकि सिंगरौली में सब कुछ अलग चलता है यहां एक बार कोई आ जाता है दुर्भाग्य से या सौभाग्य से कहूं किसी की पोस्टिंग हो जाती है तो यहां से कोई जाने को तैयार अन्यत्र जिले में नहीं होता है क्यों क्योंकि सिंगरौली से इनका प्रेम हो जाता है और यह सिंगरौली के लोगों से नहीं बल्कि कोयला कबाड़ एवं डीजल माफियाओं से यह प्रेम स्पष्ट दिखाई देता है इसलिए कह रहा हूं क्योंकि अगर सिंगरौली के लोगों से प्रेम होता तो सिंगरौली के लोग आज धूल डस्ट कोयला खाने को मजबूर ना होती समस्याओं को लेकर परेशान ना होती रोजगार को लेकर दर-दर न भटकते अन्यत्र जिले में जाकर रोजगार के लिए जीवन ना जीते और खासकर जिले का मोरवा थाना यहां एक बार जो थाना प्रभारी आ गया वह जिले के दूसरे थाने में जाने के लिए नाम नहीं लगा क्यों क्योंकि कमाऊ थाना है कोयला कबाड़ डीजल एवं अन्य व्यापार खुलेआम चलते सूत्रों की माने तो मोरवा थाने में आने के लिए लोग सीधा भोपाल मंत्रालय में सोर्स लगते हैं क्यों क्योंकि मोरवा थाने में थाना प्रभारी की पोस्टिंग करने के लिए एसपी साहब की जरूरत नहीं पड़ती हैं फिलहाल नियम में है जिले के एसपी को मोरवा थाने में किसी भी थाना प्रभारी की पोस्टिंग कर सकते हैं पर ऐसा होता नहीं है क्यों क्योंकि यहां सीधा मुख्यमंत्री उपमुख्यमंत्री का चलता है और उनके बगैर किसी दूसरे को थाने की कमान नहीं दी जाती अभी वर्तमान में जो थाना प्रभारी मोरवा है पूर्व में कई बार मोरवा थाने में रह चुके हैं इसके बावजूद भी अभी हाल ही में कुछ महीने पूर्व मोरवा थाने का प्रभार दिया गया क्यों क्योंकि इनका सीधे भोपाल मंत्रालय से पहुंच हैं और यह पहुंच चोर गुंडा डकैत कोयला कबाड़ और डीजल माफिया का मनोबल बढ़ा रहा और इस थाने में सबसे खास बात अगर कोई थाना प्रभारी है तो उसके हिसाब से अन्य पुलिस कर्मियों की पदस्थापना होती है अब त्रिभुवन मिश्रा को ही देख लीजिए यह भी सैकड़ो बार मोरवा थाने में रह चुके हैं इसके बावजूद अभी वर्तमान में है क्यों क्योंकि इनको सब पता है मोरवा थाना क्षेत्र में कोयला कबाड़ और डीजल का खेल कहां से शुरू होता है कौन करता है और कौन नया उत्पन्न होगा क्योंकि यह थाना के कार्यखास बताएं जा रहे हैं त्रिभुवन मिश्रा जी और थाना प्रभारी इन दोनों की बढ़िया बनती है यही वजह है इन दोनों को एक साथ मोरवा थाने में यथावत रखा गया है पुनः हालही में मोरवा थाना क्षेत्र में 15 वर्षीय किशोर की हत्या हुई आगजनी पथराव पुलिस पब्लिक मुठभेड़ सब कुछ हुआ इसके बावजूद भी देखिए यथावत जमे हुए हैं भला किसकी हिम्मत जो इनको छू दे ऐसा किसी की हिम्मत नहीं है फिलहाल वरिष्ठ अधिकारियों को मोरवा थाने में पदस्थ पुलिस कर्मियों की सूची मंगवाकर जिले के अन्यत्र थाना चौकी में पदस्थ करना चाहिए जिससे कानून व्यवस्था बनी रहे और पब्लिक का भरोसा पुलिस पर बना रहे ऐसा वरिष्ठ अधिकारियों को करना चाहिए खैर पुलिस लाइन में पांच पांच थाना प्रभारी पड़े हुए हैं कोई पूछ नहीं रहा कि इनको थाना दे दिया जाए क्यों क्योंकि इनकी पहुंच नहीं है और यदि है भी तो भोपाल तक नहीं है और भोपाल तक है तो मुद्रा नहीं है जितना फाइनेंस कर सके यही वजह है आज लगभग पांच थाना प्रभारी पुलिस लाइन में पड़े हुए हैं और सिर्फ एक थाना से दूसरे थाने में पसंदीदा थाना प्रभारी को पदभार दिया जा रहा जबकि इन्हें जिले से बाहर करना चाहिए कई बार जिले के अलग-अलग थाने में सेवाएं दे चुके हैं अब इन्हें अन्यत्र जिले के अन्यत्र थानों में पोस्टिंग करनी चाहिए फिलहाल थाना प्रभारी के कार्यकाल भी पूर्ण हो चुके हैं इस पर भी वरिष्ठ अधिकारियों को संज्ञान लेना चाहिए फिलहाल अगले अंक में विस्तार से बताएंगे मोरवा क्षेत्र में किस प्रकार की गतिविधियां है
मोरवा हत्याकांड: पुलिस की चुप्पी, सवालों का दौर?
मोरवा थाना क्षेत्र में 15 वर्षीय किशोर पवन शाह की हत्या हुई इसके बाद आगजनी, पथराव और पुलिस-पब्लिक के बीच सीधा टकराव तक हुआ। हालात इतने बिगड़े कि पुलिस की गाड़ियों से बम तक निकाल लिए गए, गाड़ियों के टायरों की हवा निकाल दी गई
लेकिन सबसे बड़ा सवाल—इस पूरे घटनाक्रम में थाना प्रभारी कहां थे?
जिस तरह की सक्रियता थाना प्रभारी को दिखानी चाहिए थी, वह पूरी तरह नदारद रही। न तो वे पब्लिक के बीच नजर आए, न ही किसी वीडियो में उनकी मौजूदगी दिखी।
अगर वे मौके पर थे, तो एक भी वीडियो सार्वजनिक क्यों नहीं?
क्या पुलिस के पास कोई फुटेज नहीं, या जानबूझकर छुपाया जा रहा है?
सच यही है—थाना प्रभारी पब्लिक के बीच जाना उचित नहीं समझे।
कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्हें पब्लिक के गुस्से का डर था?
अगर ऐसा है, तो यह और भी गंभीर मामला है। क्योंकि जो अधिकारी जनता के बीच जाने से डरता हो, वह कानून-व्यवस्था कैसे संभालेगा? वरिष्ठ अधिकारियों को तुरंत संज्ञान लेकर ऐसे थाना प्रभारी को हटाना चाहिए और मोरवा को समझने वाला, जमीनी और निर्भीक अधिकारी वहां पदस्थ करना चाहिए।
सबसे बड़े सवाल:
👉 क्या मोरवा थाना “कमाऊ सेंटर” बन चुका है?
👉 क्या पोस्टिंग अब योग्यता से नहीं, पहुंच और पैसों से तय हो रही है?
👉 क्या कानून अब माफियाओं के इशारे पर चल रहा है?
जमीनी सच्चाई:
• ओवरलोड गाड़ियां = मौत का खेल • कोयला चोरी = खुलेआम
• डीजल कारोबार = बेकाबू • कबाड़ माफिया = सिस्टम के भीतर तक
⚠️ यह खबर नहीं, सिस्टम के खिलाफ चार्जशीट है
अगले अंक में बड़ा खुलासा: मोरवा के माफिया नेटवर्क का पूरा कच्चा चिट्ठा…कौन? कैसे? किसके संरक्षण में?












