मोरवा बना ‘मौत का कॉरिडोर’ — कोयला परिवहन माफियाओं की दबंगई से शहर गैस चैंबर में तब्दील, प्रशासन और प्रबंधन मौन!
ओवरलोड हाईवा, शराबी चालक, टूटी सड़कों का जाल और उड़ती जहरीली धूल—हर सांस बन रही खतरा, जिम्मेदारों की चुप्पी पर उठे गंभीर सवाल

सिंगरौली का मोरवा जो नगर पालिका निगम सिंगरौली का एक वर्ड है यानी शहर में गिनती होती है ऐसे मोरवा में अब लोगों को सांस लेना बड़ी मुश्किल हो गया है क्यों क्योंकि ट्रांसपोर्टर के दबंगई कोयला परिवहन करने वाली गाड़ियां ओवरलोड चलती है अनियंत्रित होकर चलती है चालक शराब के नशे में चलते हैं स्थितियां आ गई है कि अब इनके तेज रफ्तार ओवरलोडिंग कोयला परिवहन की वजह से सड़के टूट चुकी है हालात बेहद गंभीर है धूल डस्ट अत्यधिक मात्रा में उड़ता है समय पर पानी का छिड़काव नहीं किया जाता है और कुछ जगह में छिड़काव किया जाता है तो और भी स्थिति गंभीर हो जाती है क्योंकि धूल और डस्ट सड़क को अपनी ओर आकर्षित कर लिए जिस वजह से कुछ जगह पर पानी का छिड़काव करने के बावजूद भी धूल डस्ट जमे रहते हैं और हर एक सेकंड में कोयला परिवहन करने वाली टेलर हाईवा गुजराती है ओवरलोडिंग कोयला के साथ तो समझ सकते हैं धूल डस्ट कम होने की संभावना से ज्यादा कई गुना बढ़ाने की संभावना रहती है और बढ़ती भी पर दुर्भाग्य है इस रास्ते से जिला प्रशासन का हर वह पहलू हर वह चेहरा गुजरता है जो अगर चाह ले तो ऐसी स्थिति निर्मित नहीं होगी पर आंखों में काली पट्टी वाले रहते हैं देख कर भी अनदेखा करते हैं यही स्थिति है सिंगरौली का मोरवा शहर के स्थानीय लोग अब जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं परेशान है दर्द बांटना चाहते हैं पर ना जिला प्रशासन सुनता नहीं स्थानीय जनप्रतिनिधि और सबसे खास बात मोरवा यहां से एनसीएल हेड क्वार्टर की दूरी 1 किलोमीटर भी नहीं होगी ऐसे में इस प्रकार के कृत्य और स्थानीय लोगों का जीवन खतरे में कहीं ना कहीं यह दर्शाता है कि जिला प्रशासन एनसीएल प्रबंधन निष्क्रिय है स्थानीय जनप्रतिनिधि निष्क्रिय है जनता का वोट लेने के बाद जनता का सुनने के बजाय जिला प्रशासन का मनोबल बढ़ा रहे बाहर से आई कंपनियां के अधिकारियों का मनोबल बढ़ा रहे हैं
मोरवा की सड़कों पर ‘दहशत’ का राज
मोरवा अब सिर्फ एक वार्ड या शहर का हिस्सा नहीं रहा, बल्कि यह एक ऐसा इलाका बन चुका है जहां हर पल खतरा मंडराता रहता है। कोयला परिवहन में लगी हाईवा और ट्रेलर गाड़ियां सड़कों पर बेलगाम दौड़ रही हैं। ओवरलोडिंग इतनी है कि वाहन खुद असंतुलित हो जाते हैं, और ऊपर से तेज रफ्तार—यानी हादसा कभी भी, कहीं भी स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार ये गाड़ियां इतनी तेजी से गुजरती हैं कि सड़क किनारे चल रहे लोग डर के मारे ठिठक जाते हैं। बच्चों को स्कूल भेजना, बुजुर्गों का घर से निकलना—सब एक जोखिम भरा काम बन गया है
शराबी चालकों का कहर — कौन लेगा जिम्मेदारी?
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन भारी वाहनों को चलाने वाले कई चालक शराब के नशे में होते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इन पर निगरानी कौन रख रहा है? क्या ट्रांसपोर्ट कंपनियों के लिए मानव जीवन की कोई कीमत नहीं? शराब के नशे में वाहन चलाना सीधे-सीधे कानून का उल्लंघन है, लेकिन मोरवा में यह एक आम बात बन चुकी है। यह स्थिति न केवल लापरवाही बल्कि खुलेआम कानून की अवहेलना को दर्शाती है
टूटी सड़कें, उड़ती धूल — ‘विकास’ की असल तस्वीर
ओवरलोड वाहनों के कारण मोरवा की सड़कें पूरी तरह से जर्जर हो चुकी हैं। गड्ढों में तब्दील सड़कें अब दुर्घटनाओं को न्योता दे रही हैं। वहीं, दिनभर उड़ती धूल ने पूरे इलाके को ढक रखा है धूल की स्थिति इतनी खराब है कि कई जगह पर दृश्यता तक प्रभावित हो जाती है। लोग घरों के दरवाजे-खिड़कियां बंद रखने को मजबूर हैं, फिर भी धूल अंदर तक पहुंच रही है
पानी का छिड़काव या दिखावा?
धूल नियंत्रण के नाम पर पानी का छिड़काव किया जाता है, लेकिन यह भी एक औपचारिकता बनकर रह गया है। कई जगह छिड़काव नहीं होता, और जहां होता है वहां स्थिति और बदतर हो जाती है गीली मिट्टी और धूल मिलकर सड़क को चिपचिपा और खतरनाक बना देती है, जिससे वाहन फिसलने का खतरा बढ़ जाता है। यानी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि नया खतरा पैदा किया जा रहा है
हर सेकंड पर गुजरती मौत जिम्मेदार आखिरकार है कौन?
मोरवा की सड़कों पर हर सेकंड कोयला लदे ट्रेलर और हाईवा गुजरते हैं। इतनी अधिक संख्या में वाहनों की आवाजाही ने पूरे इलाके को इंडस्ट्रियल ट्रांजिट कॉरिडोर बना दिया है, लेकिन बिना किसी सुरक्षा, बिना किसी नियंत्रण के यहां रहने वाले लोग अब खुलेआम कहते हैं—
“हम सड़क के किनारे नहीं, मौत के किनारे रह रहे हैं प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की संदिग्ध चुप्पी
सबसे गंभीर सवाल यही है कि आखिर जिम्मेदार लोग चुप क्यों हैं? जिला प्रशासन के अधिकारी, जनप्रतिनिधि, और संबंधित विभाग इस रास्ते से रोज गुजरते हैं। फिर भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती यह चुप्पी अब शक के घेरे में है क्या यह सिर्फ लापरवाही है, या इसके पीछे कोई और खेल चल रहा है?
एनसीएल मुख्यालय के पास भी बदहाली
मोरवा से एनसीएल हेड क्वार्टर की दूरी 1 किलोमीटर भी नहीं है ऐसे में यह उम्मीद की जाती है कि यहां व्यवस्थाएं बेहतर होंगी, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है इतने बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठान के पास रहने के बावजूद अगर लोग बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षित वातावरण से वंचित हैं, तो यह सीधे-सीधे प्रबंधन की विफलता को उजागर करता है
जनता का गुस्सा — अब चुप्पी टूटेगी
स्थानीय लोगों में आक्रोश लगातार बढ़ रहा है। लोग अब अपनी समस्याओं को लेकर खुलकर सामने आने लगे हैं। उनका कहना है कि अगर जल्द ही कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो वे आंदोलन के लिए मजबूर होंगे
ओवरलोड वाहनों पर कार्रवाई कब होगी? शराब पीकर गाड़ी चलाने वालों पर रोक क्यों नहीं? धूल नियंत्रण के लिए स्थायी व्यवस्था कब बनेगी?
टूटी सड़कों की मरम्मत कब होगी? आखिर प्रशासन और प्रबंधन कब जागेंगे मोरवा की स्थिति अब सिर्फ एक स्थानीय समस्या नहीं रह गई है, यह प्रशासनिक संवेदनहीनता और सिस्टम की विफलता का जीवंत उदाहरण बन चुकी है।












