होली का रंग बना मातम: मोरवा में लापरवाही की पराकाष्ठा, लापता किशोर का शव मिलने के बाद भड़की हिंसा — पुलिस की भूमिका कटघरे में
होली का रंग बना मातम: मोरवा में लापरवाही की पराकाष्ठा, लापता किशोर का शव मिलने के बाद भड़की हिंसा — पुलिस की भूमिका कटघरे में

सिंगरौली : जिले के मोरवा में 4 मार्च 2026, होली के दिन वही स्थाई निवासी 15 वर्षीय किशोर पवन शाह एवं अवैध शराब बिक्री करने वाले पंकज गुप्ता एवं उनके सहयोगी इरशाद अनवर के बीच रंग लगाने को लेकर विवाद होता और यह रंग लगाना किशोर पवन शाह के लिए बहुत बड़ी चुनौती हो जाती है। फिलहाल यह मामला होली के दिन ही मोरवा थाने में पहुंचता है और मौजूद पुलिसकर्मियों द्वारा होली का त्योहार समझकर इस मामले को आपसी भाईचारे में बदल दिया जाता है और दोनों पक्ष को वापस भेज दिया जाता है लेकिन यही “समझौता” आगे चलकर एक मासूम की जिंदगी पर भारी पड़ गया परिणाम यह निकलता है कि किशोर पवन शाह कुछ घंटे बाद लापता हो जाता है। पीड़ित परिवार परेशान होकर पुनः मोरवा थाने पहुंचता है जहां गुमशुदगी का अपराध कायम होता है और पवन को ढूंढने की कोशिश की जाती है। 3 दिन तक पवन का कोई पता जानकारी नहीं मिलता यह तीन दिवस बीतने के बाद जब पीड़ित परिवार मोरवा पुलिस से उम्मीद खोकर जब धरने पर बैठ जाता है — वह भी थाने के मुख्य द्वार पर — तब पुलिस हरकत में आती है और तब जो सच्चाई सामने आती है, उसने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया जानकारी मिलती है कि जो किशोर पवन लापता हुआ था उसका शव मोरवा थाने से महज 3 किलोमीटर दूर रेलवे स्टेशन के समीप एक नदी के करीब जंगल के आसपास मिलता है यहां से मामला और भी भयावह हो जाता है पीड़ित परिवार और भी आक्रोश हो जाता है, क्यों क्योंकि पहले तो होली के दिन जब रंग लगाने को लेकर विवाद हुआ तब पुलिस ने समझौता कर दिया, और फिर जब लापता हुआ तो गुमशुदगी कायम करने के बाद ढूंढने में देर कर दी और सबसे चौंकाने वाली बात — किशोर का शव पीड़ित परिवार को समय पर नहीं दी जा रही यही वह चिंगारी थी जिसने पूरे मोरवा को आग में झोंक दिया आक्रोश इतना बढ़ा कि स्थिति बेकाबू हो गई पूरे मोरवा के लोग इकट्ठा होकर आगजनी करने लगे, तोड़फोड़ करने लगे, पुलिस के बीच मुठभेड़ शुरू हुई, पुलिस की गाड़ियों का हवा खुलने लगा, पुलिस की गाड़ियों से बम, गोला-बारूद तक निकाल लिए गए
यह केवल विरोध नहीं था — यह प्रशासनिक लापरवाही के खिलाफ फूटा जनाक्रोश था
जब हालात हाथ से निकलने लगे, तब जाकर जिले से बाहर यानी जिला सीधी, रीवा, सतना जैसे जिलों से भारी पुलिस फोर्स बुलाई गई इसके बावजूद भी पब्लिक शांत नहीं हुई — क्योंकि मोरवा पुलिस पर से भरोसा पूरी तरह खत्म हो चुका था लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे आश्चर्यजनक और गंभीर सवाल खड़ा करने वाली बात यह रही कि —
मोरवा थाना प्रभारी पूरे घटनाक्रम के दौरान कहीं नजर नहीं आए।
इतना बड़ा विवाद, थाना के मुख्य द्वार पर धरना, आगजनी, पथराव, पुलिस-पब्लिक मुठभेड़ — लेकिन किसी भी वीडियो में थाना प्रभारी जनता से संवाद करते हुए नहीं दिखे थाना प्रभारी महोदय कहीं नहीं दिखे, जो वीडियो देखने के बाद ऐसा प्रतीत हो रहा है, पर अगर थाना प्रभारी महोदय पब्लिक के बीच गए होंगे तो कोई भी एक वीडियो जरूर होगी — पब्लिक के पास ना सही, पुलिस के पास होगी, थाना प्रभारी मोरवा के पास होगी — उसे सार्वजनिक किया जाए जबकि हकीकत यह है कि थाना गेट से थाना प्रभारी के चैंबर की दूरी मात्र 50 मीटर है, और उनका सरकारी आवास भी थाने से मात्र 60 से 70 मीटर की दूरी पर स्थित है
ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है —
क्या थाना प्रभारी ने जानबूझकर दूरी बनाए रखी? क्या उन्हें आशंका थी कि वे जनता के आक्रोश का सामना नहीं कर पाएंगे? या फिर वे हालात को संभालने में खुद को असमर्थ मान बैठे थे? यदि ऐसा है तो यह केवल व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है क्योंकि किसी भी थाना प्रभारी का पहला कर्तव्य होता है कि विवाद को दंगे में बदलने से पहले वह स्वयं मौके पर उपस्थित होकर जनता से संवाद करे, स्थिति को नियंत्रित करे और दोषियों पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करे लेकिन यहां ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ
अब सवाल सीधा है —क्या ऐसे थाना प्रभारी को उस स्थान पर बनाए रखना उचित है, जहां कानून व्यवस्था पहले से संवेदनशील हो?
क्या जिले के वरिष्ठ अधिकारी, आईजी और डीजीपी भोपाल इस पूरे मामले को गंभीरता से लेंगे?
क्या यह नहीं सोचना चाहिए कि जिस अधिकारी को मैदान में उतरने में झिझक हो, उसे किसी सुरक्षित स्थान पर पदस्थ किया जाए?
और मोरवा जैसे संवेदनशील थाने की कमान ऐसे अधिकारी को दी जाए, जो संकट की घड़ी में नेतृत्व कर सके? यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि पुलिस लाइन में 5 से अधिक निरीक्षक मौजूद हैं तो क्या उनमें से किसी एक को मोरवा थाने की जिम्मेदारी देना जिले के कप्तान को उचित नहीं लगता? या फिर इसके पीछे कोई और वजह है? क्या किसी का दबाव है? क्या राजनीतिक हस्तक्षेप है? या फिर सिस्टम के भीतर ऐसी कौन-सी मजबूरी है, जो सब कुछ सामने होने के बावजूद भी कार्रवाई को रोक रही है? आंदोलन, दंगा, आगजनी, पथराव, पुलिस मुठभेड़ — इतना सब कुछ होने के बावजूद भी अगर थाना प्रभारी को यथावत रखा जाता है, तो यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि जनता के विश्वास के साथ खिलवाड़ भी माना जाएगा सबसे अहम तथ्य यह है कि पीड़ित परिवार मोरवा पुलिस से उम्मीद को बैठा है, मोरवा पुलिस से जांच ना करवा कर अन्य टीम से उम्मीद करता है — ऐसा पीड़ित परिवार का कहना है।
यह बयान स्वयं में पुलिस व्यवस्था की साख पर गंभीर प्रश्नचिह्न है फिलहाल थाना प्रभारी का ट्रांसफर करना या ना करना या इससे अनोखी कल्पना को कोई लेना देना नहीं लेकिन जो सच्चाई है, उसे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सामने लाना ही पहला कर्तव्य है और सच्चाई यही है कि —एक छोटे से विवाद को समय पर गंभीरता से नहीं लिया गया, एक लापता किशोर को समय पर ढूंढा नहीं गया,एक परिवार को न्याय के लिए दर-दर भटकना पड़ा, और अंततः एक पूरे क्षेत्र को सड़कों पर उतरकर आक्रोश जताना पड़ा अब सवाल केवल पवन शाह की मौत का नहीं है सवाल है व्यवस्था की जवाबदेही का ,सवाल है पुलिस की भूमिका का और सवाल है उस भरोसे का, जो अब मोरवा की जनता खो चुकी है…..












