अजीत सिंह परिहार और विवेक सिंह बघेल को अचानक लाइन अटैच, त्रिभुवन मिश्रा की एंट्री; थाना प्रभारी बदलते ही स्टाफ में फेरबदल पर उठे गंभीर सवाल, निष्पक्ष जांच की मांग तेज
अजीत सिंह परिहार और विवेक सिंह बघेल को अचानक लाइन अटैच, त्रिभुवन मिश्रा की एंट्री; थाना प्रभारी बदलते ही स्टाफ में फेरबदल पर उठे गंभीर सवाल, निष्पक्ष जांच की मांग तेज

सिंगरौली: जिले के मोरवा थाने में हाल ही में हुए पुलिसकर्मियों के तबादले और लाइन अटैचमेंट ने एक बार फिर पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जानकारी के मुताबिक, मोरवा थाने में पदस्थ अजीत सिंह परिहार और विवेक सिंह बघेल को बीते दिनों गोपनीय तरीके से लाइन अटैच कर दिया गया। इसके साथ ही त्रिभुवन मिश्रा को मोरवा थाने में पदस्थ किया गया, जो पूर्व में कई बार इसी थाने में अपनी सेवाएं दे चुके हैं बताया जा रहा है कि अजीत सिंह परिहार को लाइन अटैच करने के तुरंत बाद कोतवाली थाने में पदस्थ कर दिया गया, जिसकी वजह उनकी वहां के थाना प्रभारी अशोक सिंह परिहार से नजदीकी बताई जा रही है। वहीं विवेक सिंह बघेल को फिलहाल लाइन में ही रखा गया है इस पूरे घटनाक्रम के पीछे मुख्य वजह मोरवा थाना प्रभारी का बदलाव बताया जा रहा है। पहले यहां थाना प्रभारी उमेश प्रताप सिंह पदस्थ थे, जिनकी जगह अब कपूर त्रिपाठी ने कार्यभार संभाला है। थाना प्रभारी बदलते ही स्टाफ में बड़े स्तर पर फेरबदल ने कई तरह के सवाल खड़े कर दिए हैं।
जातिगत आधार पर पोस्टिंग के गंभीर आरोप
स्थानीय स्तर पर यह आरोप तेजी से चर्चा में है कि सिंगरौली जिले के कई थानों और चौकियों में पोस्टिंग जातिगत समीकरण के आधार पर की जा रही है। लोगों का कहना है कि थाना प्रभारी के अनुसार ही उनके मनचाहे पुलिसकर्मियों को संबंधित थानों और चौकियों में पदस्थ किया जाता है।
कुछ लोगों ने यहां तक कहा कि यदि इस पर संदेह है तो कोई भी व्यक्ति आरटीआई के माध्यम से या सीधे थाने में जाकर स्टाफ की सूची देखकर सच्चाई जान सकता है। आरोप है कि थाना प्रभारी के नाम के अंतिम शब्द और स्टाफ के नामों का मिलान करने पर स्थिति साफ हो सकती है।
प्रशासनिक व्यवस्था पर उठे सवाल
विशेषज्ञों और स्थानीय नागरिकों का मानना है कि पुलिस विभाग में नियुक्तियां योग्यता के आधार पर होनी चाहिए, न कि जातिगत आधार पर। यदि इस तरह के आरोपों में सच्चाई है तो यह न केवल प्रशासनिक व्यवस्था को कमजोर करता है, बल्कि पुलिस की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े करता है।
राजनीतिक हस्तक्षेप के भी आरोप
इस पूरे मामले में स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि बिना राजनीतिक दबाव के इस तरह की पोस्टिंग संभव नहीं होती। थाना और चौकी स्तर पर भी छोटे कर्मचारियों के शोषण की बात सामने आ रही है, जहां उन्हें बार-बार इधर-उधर किया जाता है।
उच्चस्तरीय जांच की मांग
मामले की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय लोगों ने रीवा संभाग के आईजी और भोपाल स्थित डीजीपी से पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच की मांग की है। साथ ही मोरवा थाने में वर्तमान में पदस्थ सभी पुलिसकर्मियों की सूची मंगाकर पारदर्शिता सुनिश्चित करने की बात कही जा रही है फिलहाल मोरवा थाना इन दिनों सिर्फ कानून-व्यवस्था के लिए नहीं, बल्कि पोस्टिंग और ट्रांसफर की राजनीति को लेकर भी चर्चा में है। अब देखना यह होगा कि उच्च अधिकारी इन गंभीर आरोपों को कितनी गंभीरता से लेते हैं और क्या वास्तव में निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाते हैं या यह मामला भी अन्य मामलों की तरह ठंडे बस्ते में चला जाएगा।












