न्यायालय में विचाराधीन ज़मीन की खुलेआम बिक्री रिश्वतखोर पटवारी पर ₹1.10 लाख लेने का आरोप
न्याय की आस में पिता की मौत, बेटी सिस्टम से लड़ने को मजबूर

सिंगरौली जिले में राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर कठघरे में है। न्यायालय में विचाराधीन भूमि को जानबूझकर गुमराह कर बेचने, नामांतरण के बदले खुलेआम रिश्वत लेने और फिर रिकॉर्ड से नाम गायब करने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। यह मामला सिर्फ एक परिवार की ठगी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर गंभीर आरोप है—जहां रिश्वत लेकर नियम, कानून और न्याय तीनों को कुचला गया।
कोर्ट में विचाराधीन ज़मीन… फिर भी रजिस्ट्री कैसे?
पीड़ित रूपचंद साकेत (निवासी ग्राम जैतपुर, पुलिस चौकी जयंत) ने बताया कि उन्होंने ग्राम सिद्धीकला स्थित भूमि को भूमिस्वामी गंगाराम वैश्य से खरीदा। सौदे की कुल कीमत ₹16,44,000 तय हुई।
₹9,95,000 चेक से
₹6,49,000 नकद
₹2,00,000 रजिस्ट्री व खर्च
कुछ महीनों बाद सच्चाई सामने आई—यह ज़मीन पहले से ही न्यायालय में विचाराधीन थी और रजिस्ट्री शून्य घोषित हो गई। बड़ा सवाल यह है कि यदि भूमि विवादित थी, तो रजिस्ट्री किसके संरक्षण में हुई? क्या राजस्व अमले को इसकी जानकारी नहीं थी, या जानबूझकर आंखें मूंदी गईं?
नामांतरण के बदले रिश्वत, फिर सुनियोजित खेल
रजिस्ट्री के बाद नामांतरण के लिए पीड़ित जब हल्का पटवारी गंगा सिंह वैश्य के पास पहुंचा, तो आरोप है कि बिना रिश्वत काम करने से साफ इनकार कर दिया गया।
पीड़ित का आरोप—
₹10,000 फोन-पे के जरिए
₹1,00,000 नगद रिश्वत
रिश्वत देने के बाद नामांतरण तो हुआ, लेकिन कुछ ही दिनों में पीड़ित को एक और झटका दिया गया। रिकॉर्ड से उनका नाम गायब कर दिया गया और खसरे में छोटकी बेवा रामलगन केवट सहित अन्य लोगों के नाम दर्ज कर दिए गए। यह सब तब किया गया, जब भूमि पहले से ही विवादित थी।
पटवारी–भूमिस्वामी की मिलीभगत, ₹20 लाख तक की ठगी
पीड़ित का सीधा आरोप है कि यह पूरा खेल पटवारी गंगा सिंह वैश्य और भूमिस्वामी गंगाराम वैश्य की मिलीभगत से रचा गया। विवादित भूमि को बेचकर ₹18 से ₹20 लाख की रकम हड़प ली गई।
न तो ज़मीन पीड़ित को मिली, न ही उसकी मेहनत की कमाई वापस हुई।
सबूत मौजूद, कार्रवाई नदारद—किसे बचाया जा रहा है?
फोन-पे ट्रांजेक्शन जैसे पुख्ता डिजिटल सबूत सामने होने के बावजूद पटवारी के खिलाफ आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। जांच के नाम पर सिर्फ कागजी खानापूर्ति की जा रही है। सवाल यह है—
क्या राजस्व विभाग के भीतर बैठे बड़े अधिकारी इस खेल में शामिल हैं?
क्या रिश्वतखोरी को मौन संरक्षण दिया जा रहा है?
न्याय की प्रतीक्षा में पिता का निधन, बेटी आज भी संघर्ष में
सालों तक न्याय की आस लगाए पीड़ित पिता का इंतजार ही खत्म हो गया—उनका निधन हो गया। लेकिन सिस्टम की बेरुखी यहीं नहीं रुकी। आज उनकी बेटी अकेली तहसील, कलेक्टरेट और थानों के चक्कर काटने को मजबूर है।
अब पीड़ित परिवार को नए जिला कलेक्टर से उम्मीद है। बताया जा रहा है कि कलेक्टर ने तहसीलदार को जांच के निर्देश दिए हैं। लेकिन सवाल अब भी कायम है—
क्या दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी, या यह मामला भी दबा दिया जाएगा?












