दलालों के भरोसे चल रहा आरटीओ कार्यालय? मोरवा बना कार्रवाई का एकतरफा केंद्र, अवैध गतिविधियों पर चुप्पी
दलालों के भरोसे चल रहा आरटीओ कार्यालय? मोरवा बना कार्रवाई का एकतरफा केंद्र, अवैध गतिविधियों पर चुप्पी
सिंगरौली। जिले के परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली इन दिनों सवालों के घेरे में है। आरोप है कि आरटीओ सिंगरौली विक्रम सिंह राठौर अवैध गतिविधियों पर प्रभावी अंकुश लगाने की बजाय चुनिंदा क्षेत्रों में ही कार्रवाई कर रहे हैं, जबकि पूरे जिले में नियमों की खुलेआम अनदेखी हो रही है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज है कि आरटीओ कार्यालय प्राइवेट दलालों के सहारे संचालित हो रहा है और बिना “सिफारिश” के आम नागरिकों का काम आगे नहीं बढ़ता।
सूत्रों के मुताबिक जिले में बिना परमिट वाहन संचालन, ओवरलोडिंग, फिटनेस फेल गाड़ियां, टैक्स बकाया जैसी गंभीर अनियमितताएं लंबे समय से जारी हैं, लेकिन इन पर अपेक्षित सख्ती नजर नहीं आती। इसके विपरीत मोरवा क्षेत्र को बार-बार कार्रवाई का केंद्र बनाया जा रहा है। स्थानीय वाहन चालकों का आरोप है कि मोरवा में नियमित चेकिंग और चालान के नाम पर दबाव बनाया जाता है, जबकि अन्य क्षेत्रों में नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहन बेधड़क सड़कों पर दौड़ रहे हैं।
वाहन मालिकों और चालकों का कहना है कि आरटीओ कार्यालय में दलालों की मजबूत पकड़ है। दस्तावेजों के नवीनीकरण से लेकर फिटनेस, परमिट और लाइसेंस से जुड़े कामों में बिचौलियों की भूमिका निर्णायक बताई जा रही है। जिनके पास पहचान या पहुंच है, उनके काम बिना बाधा पूरे हो जाते हैं, जबकि आम लोग कार्यालय के चक्कर काटने को मजबूर हैं। इससे न केवल जनता का भरोसा कमजोर हो रहा है, बल्कि शासन की छवि पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
प्रशासनिक हलकों में यह भी चर्चा है कि कार्रवाई का एकतरफा रवैया संदेह पैदा करता है। यदि नियम सबके लिए समान हैं तो पूरे जिले में समान रूप से लागू क्यों नहीं हो रहे? क्या प्रभावशाली लोगों और संगठित दलाल नेटवर्क को अघोषित संरक्षण मिल रहा है? इन सवालों के जवाब अभी तक सामने नहीं आए हैं।
जानकारों का कहना है कि परिवहन विभाग का दायित्व केवल चालान काटना नहीं, बल्कि सड़क सुरक्षा, नियमों का निष्पक्ष पालन और अवैध गतिविधियों पर रोक लगाना है। यदि विभाग की प्राथमिकताएं सीमित क्षेत्रों तक सिमट जाएं और बड़े उल्लंघनों पर चुप्पी बनी रहे, तो इसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ता है।
अब निगाहें जिला प्रशासन और परिवहन विभाग के उच्च अधिकारियों पर टिकी हैं। क्या इन गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच होगी? क्या दलाल तंत्र पर कार्रवाई कर व्यवस्था को पारदर्शी बनाया जाएगा? या फिर यह मामला भी कागजी कार्रवाई और आश्वासनों तक सीमित रह जाएगा।
सिंगरौली की जनता स्पष्ट जवाब चाहती है—कानून का राज या दलालों का दबदबा?













