सड़कें टूटीं, धूल से दम घुटा, –शहर नहीं, कोयला कॉरिडोर
सड़कें टूटीं, धूल से दम घुटा, –शहर नहीं, कोयला कॉरिडोर

मोरवा में कोयला-हाईवा आतंक: शहर या माफिया का कॉरिडोर
सिंगरौली जिले का मोरवा—जो नगर निगम का वार्ड होने के साथ एक पूरा शहर है—आज आम नागरिकों के लिए रहने की जगह कम और कोयला परिवहन का खतरनाक कॉरिडोर ज़्यादा बन चुका है। प्रतिदिन 100 से अधिक हाईवा–टेलर कोयले से लदे हुए मोरवा की सड़कों पर दौड़ते हैं। हालत यह है कि सड़कें पूरी तरह टूट चुकी हैं, लेकिन भारी वाहनों का आवागमन रुकने का नाम नहीं ले रहा।
धूल और डस्ट का ऐसा गुबार उड़ता है कि पैदल चलना, साइकिल या दोपहिया से निकलना तो दूर, घरों में रहना तक मुश्किल हो गया है। सवाल यह है कि जो स्थानीय निवासी रोज़ यह सब अपनी आंखों से देखते हैं, वे आखिर कैसे जीवन यापन कर रहे हैं?
24 घंटे सड़क पर कब्ज़ा, बच्चों की जान जोखिम में
मोरवा की सड़कों के कई हिस्सों में 24 घंटे भारी वाहन खड़े रहते हैं, जबकि अन्य हिस्सों में तेज़ रफ्तार हाईवा दौड़ाए जाते हैं। स्कूल जाने वाले बच्चे, बुज़ुर्ग और महिलाएं हर पल हादसे के डर में जी रहे हैं। सड़कें चलने के लिए बनी थीं, लेकिन आज वे ट्रांसपोर्टरों की निजी पार्किंग और रेस ट्रैक बन चुकी हैं।
“थाना करोड़ों में, इसलिए कानून बंधक”
स्थानीय लोगों के आरोप बेहद गंभीर हैं। कहा जा रहा है कि मोरवा थाने की पोस्टिंग 2–3–4 करोड़ रुपये की बोली में होती है। यही वजह बताई जा रही है कि थाना प्रभारी पर जिला स्तर का नियंत्रण नहीं दिखता। आरोप है कि थाने का सीधा कनेक्शन जिला मुख्यालय से कम और भोपाल से ज़्यादा रहता है।
जब पोस्टिंग ही करोड़ों में हो, तो अपराध कम करने के बजाय “निवेश की भरपाई” प्राथमिकता बन जाती है—यह सवाल अब खुलेआम पूछा जा रहा है।
कोयला–कबाड़–डीज़ल चोरी चरम पर
मोरवा क्षेत्र में कोयला, कबाड़ और डीज़ल चोरी बड़े पैमाने पर होने के आरोप हैं। लोगों का कहना है कि डर इतना बढ़ चुका है कि रात में सड़क से गुजरते समय चोरी या भारी वाहनों की चपेट में आने का भय सताता रहता है। आरोप यह भी है कि अंकुश लगाने के बजाय माफियाओं को संरक्षण दिया जा रहा है।
स्ट्रीट लाइट भी चोरी—अंधेरे में अपराध
नगर निगम ने स्ट्रीट लाइटें तो लगाईं, लेकिन कई जगह हाई-मास्ट लाइटें ही चोरी कर ली गईं। स्थानीय लोग आरोप लगाते हैं कि यह सब जानबूझकर किया गया ताकि रात में न रोशनी रहे, न CCTV काम आए—और चोरी निर्बाध चलती रहे।
विस्थापितों के हक पर डाका, विरोध करने वालों पर कार्रवाई
स्थानीय कंपनियों पर भी गंभीर आरोप हैं। कहा जा रहा है कि विस्थापितों को रोजगार देने के बजाय बाहरी लोगों को पैसे लेकर नौकरी दी जाती है। जब स्थानीय लोग आवाज़ उठाते हैं, तो थाने से कथित तौर पर एक सूची बनाकर कंपनी को सौंप दी जाती है—कि कौन धरना, आंदोलन या प्रदर्शन कर रहा है। इसके बाद कंपनी की ओर से आवेदन मंगवाकर कार्रवाई कर दी जाती है, ताकि कोई विरोध न कर सके।
आरोप है कि इस पूरे खेल में कंपनी प्रबंधन और प्रशासन के बीच लेन–देन होता है।
बड़ा सवाल: शहर किसके भरोसे?
मोरवा में हालात ऐसे बन चुके हैं कि कानून, सुरक्षा और नागरिक अधिकार—तीनों ही सवालों के घेरे में हैं। यह शहर है या माफिया का अड्डा?
अब जरूरत है कि उच्चस्तरीय, स्वतंत्र जांच हो—हाईवा संचालन पर तत्काल नियंत्रण, सड़क सुरक्षा के कड़े उपाय, चोरी–माफिया नेटवर्क पर निर्णायक कार्रवाई और थाने–कंपनियों की कथित मिलीभगत की निष्पक्ष पड़ताल हो।
वरना मोरवा की सड़कों पर सिर्फ धूल नहीं उड़ेगी—न्याय और भरोसा भी दम तोड़ देगा।












