सिंगरौली नशे की गिरफ्त में: हर 50 मीटर पर जहर, बेरोजगारी से टूटते सपने — जिला प्रशासन एवं स्थानीय जनप्रतिनिधि सवालों के घेरे में
नशीली दवाइयों का खुला कारोबार, युवाओं का भविष्य अंधकार में; नौकरी के नाम पर लाखों की रिश्वत, आवाज उठाने वालों पर केस — आखिर कौन बचाएगा सिंगरौली?

सिंगरौली: कभी ऊर्जा राजधानी के नाम से पहचान बनाने वाला सिंगरौली जिला आज नशे की दलदल में तेजी से धंसता जा रहा है। हालात इतने भयावह हो चुके हैं कि जिले के हर कोने में नशीली दवाइयों और नशीले पदार्थों का अवैध क्रय-विक्रय खुलेआम किया जा रहा है। नशा माफियाओं के हौसले इस कदर बुलंद हैं कि अब यह कारोबार छुपकर नहीं, बल्कि बेखौफ तरीके से संचालित हो रहा है स्थिति यह बन चुकी है कि हर 50 मीटर के दायरे में नशीली दवाइयां और नशीले पदार्थ युवाओं को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। आज का युवा, जो अपने सपनों को साकार करने के लिए संघर्ष करना चाहिए, वह नशे के जाल में फंसकर अपना भविष्य बर्बाद कर रहा है। यह सिर्फ एक सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए गंभीर संकट है वहीं दूसरी ओर, जिले में बड़ी-बड़ी कंपनियां, माइंस और खदानें संचालित हो रही हैं, लेकिन स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के दरवाजे लगभग बंद हैं। बाहरी जिलों और राज्यों के लोगों को प्राथमिकता देकर नियुक्तियां की जा रही हैं, जबकि सिंगरौली के पढ़े-लिखे, शिक्षित और योग्य युवा बेरोजगारी का दंश झेलने को मजबूर हैं सबसे चौंकाने वाला और गंभीर आरोप यह है कि कंपनियों में नौकरी दिलाने के नाम पर 1 लाख से लेकर 2 लाख और 3 लाख रुपये तक की खुली दलाली और रिश्वतखोरी की जा रही है। जिन युवाओं के पास इतनी बड़ी रकम नहीं है, वे चाहकर भी नौकरी नहीं पा सकते। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह रकम असंभव है, जिसके चलते योग्य होने के बावजूद वे रोजगार से वंचित रह जाते हैं। यह भ्रष्टाचार केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की नाकामी को उजागर करता है और जब कोई युवा या आम नागरिक इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश करता है, तो आरोप है कि जिला प्रशासन द्वारा उसकी आवाज को दबाने का काम किया जाता है। विरोध करने वालों पर आपराधिक प्रकरण दर्ज कर दिए जाते हैं, जिससे वे वर्षों तक जिला न्यायालय, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के चक्कर काटते रहते हैं। इस भय के कारण अब लोग खुलकर बोलने से डरने लगे हैं स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी इस पूरे मामले में गंभीर सवालों के घेरे में है। जिन नेताओं को जनता ने अपने अधिकारों की रक्षा के लिए चुना था, वे आज जनता के साथ खड़े होने के बजाय प्रशासनिक तंत्र के साथ खड़े नजर आ रहे हैं। इससे जनता के विश्वास को गहरी ठेस पहुंच रही है और लोकतंत्र की मूल भावना पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं सबसे बड़ा सवाल प्रदेश स्तर तक पहुंचता है—जब सिंगरौली जैसे जिले में हालात इतने बिगड़ चुके हैं, तब भी जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग मौन क्यों हैं? क्या जिले के युवाओं का भविष्य यूं ही नशे और बेरोजगारी की भेंट चढ़ता रहेगा? क्या नशा माफियाओं और भ्रष्टाचार के इस गठजोड़ पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं होगी? यह स्थिति अब केवल चिंता का विषय नहीं रही, बल्कि एक बड़े जनआक्रोश का रूप लेती जा रही है। अगर समय रहते नशे के इस फैलते जाल पर कड़ी कार्रवाई नहीं की गई, स्थानीय युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता नहीं दी गई और नौकरी के नाम पर हो रही दलाली व रिश्वतखोरी पर लगाम नहीं कसी गई, तो हालात और भी विस्फोटक हो सकते हैं।












