“बड़वारा में ‘महिला सशक्तिकरण’ की पोल: 5 साल से दर-दर भटक रहीं दुर्गा समूह की महिलाएं, मेहनत की कमाई पर अफसरों की सेंध”
“बड़वारा में ‘महिला सशक्तिकरण’ की पोल: 5 साल से दर-दर भटक रहीं दुर्गा समूह की महिलाएं, मेहनत की कमाई पर अफसरों की सेंध”

संवाददाता: दिनेश पुरी गोस्वामी
मध्यप्रदेश ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के बड़े-बड़े दावे बड़वारा जनपद में पूरी तरह खोखले साबित होते नजर आ रहे हैं। यहां ‘दुर्गा स्व-सहायता समूह’ की महिलाएं पिछले पांच वर्षों से अपनी मेहनत की कमाई के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं, लेकिन उन्हें आज तक न्याय नहीं मिल सका।
मेहनत महिलाओं की, फायदा सिस्टम का?
वर्ष 2020 में दुर्गा स्व-सहायता समूह को नर्सरी संचालन की जिम्मेदारी दी गई थी समूह की महिलाओं ने पूरे समर्पण के साथ दिन-रात मेहनत कर पौधों को तैयार किया इन पौधों का वितरण मनरेगा के तहत जिले की विभिन्न पंचायतों में भी किया गया लेकिन काम पूरा होने के बाद विभाग अपने ही वादों से मुकरता नजर आया और भुगतान की प्रक्रिया अधर में लटक गई
5 साल से बकाया, नियमों की खुली अनदेखी
समूह की महिलाओं का आरोप है कि शासन की स्पष्ट नीतियों के बावजूद आज तक उन्हें पौधों की बिक्री और मेहनत का भुगतान नहीं मिला। पांच साल का लंबा समय बीत जाने के बाद भी फाइलें दफ्तरों में धूल खा रही हैं।
यह न केवल प्रशासनिक लापरवाही दर्शाता है, बल्कि गरीब महिलाओं के अधिकारों के साथ सीधा अन्याय भी है।
उजड़ गई नर्सरी, टूट गया आत्मनिर्भरता का सपना
आर्थिक तंगी के चलते अब यह नर्सरी बंद होने की कगार पर पहुंच चुकी है।
महिलाओं का कहना है कि जिस नर्सरी को उन्होंने अपने हाथों से सींचा था, वही आज वीरान हो चुकी है। लगातार नुकसान और भुगतान न मिलने के कारण उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई है और आत्मनिर्भर बनने का सपना भी बिखरता नजर आ रहा है।
सीएम हेल्पलाइन भी बेअसर
थक-हारकर महिलाओं ने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 181 पर शिकायत (क्र. 37345594) दर्ज कराई, लेकिन वहां से भी अब तक केवल आश्वासन ही मिला है। समाधान का इंतजार आज भी जारी है।
अधिकारियों पर गंभीर आरोप
समूह की महिलाओं ने बड़वारा में पदस्थ प्रभारी सूर्य प्रताप सिंह बघेल पर मनमानी और पक्षपात के गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि बार-बार निवेदन के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
“हमने यह नर्सरी आत्मनिर्भर बनने के लिए शुरू की थी, लेकिन अधिकारियों की लापरवाही ने हमारा सपना तोड़ दिया। कुछ समूहों को फायदा पहुंचाया जा रहा है, जबकि हमें नजरअंदाज किया जा रहा है।”
— अध्यक्ष/सचिव, दुर्गा स्व-सहायता समूह
प्रशासन पर उठे बड़े सवाल
एक ओर सरकार ‘महिला सशक्तिकरण’ का नारा देती है, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट दिखाई देती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर पांच वर्षों तक एक गरीब महिला समूह की फाइल क्यों दबाई गई?
क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
अब न्याय या फिर निराशा?
दुर्गा स्व-सहायता समूह की महिलाएं आज भी उम्मीद लगाए बैठी हैं कि उन्हें उनकी मेहनत का हक मिलेगा।
अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस मामले में कब तक जागता है—और क्या इन महिलाओं को उनका अधिकार मिल पाता है या फिर उनका संघर्ष यूं ही जारी रहेगा।












