‘टाइम पास नगर’ में बदला ट्रांसपोर्ट नगर: ताले में कैद करोड़ों का विकास
‘टाइम पास नगर’ में बदला ट्रांसपोर्ट नगर: ताले में कैद करोड़ों का विकास

अनोखी कल्पना स्टिंगर रिपोर्ट
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सिंगरौली में विकास की एक और शानदार मिसाल सामने आई है—जहां करोड़ों रुपये खर्च करके 87 दुकानों का भव्य कॉम्प्लेक्स तो खड़ा कर दिया गया, लेकिन उसे खोलना शायद किसी और युग की योजना में शामिल है। वार्ड क्रमांक 45 के नौगढ़ ट्रांसपोर्ट नगर में बना यह कॉम्प्लेक्स आज प्रशासनिक लापरवाही का जीवंत स्मारक बन चुका है। 8.30 करोड़ रुपये की लागत से तैयार यह भवन फिलहाल व्यापार नहीं, बल्कि उपेक्षा, सुस्ती और जिम्मेदारी से बचने की कला का केंद्र बन गया है यहां सवाल सिर्फ बंद दुकानों का नहीं है, बल्कि उस सोच का है जिसमें “निर्माण” को ही विकास मान लिया जाता है और “संचालन” को भूल जाना एक परंपरा बन चुकी है। ट्रांसपोर्ट नगर में व्यापार बढ़ाने, व्यवस्थित बाजार देने और नगर निगम की आय बढ़ाने के बड़े-बड़े दावे किए गए थे। लेकिन हकीकत यह है कि 87 दुकानें आज तक अपनी पहली बिक्री का इंतजार कर रही हैं—शायद उन्हें भी पता नहीं कि उनका उद्घाटन कब होगा स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कॉम्प्लेक्स अब “ट्रांसपोर्ट नगर” कम और “टाइम पास नगर” ज्यादा लगता है। दिन में वीरानी और रात में सन्नाटा—यहां न ग्राहक आते हैं, न दुकानदार, बस कभी-कभी प्रशासन की खामोशी जरूर गूंजती है। करोड़ों रुपये का निवेश ऐसे पड़ा है जैसे किसी ने पैसा खर्च कर के सिर्फ फोटो खिंचवाने के लिए इमारत बना दी हो गौर करने वाली बात यह है कि यह पहली बार नहीं हो रहा। गनियारी प्लाजा और नवानगर तालाब के पास बने कॉम्प्लेक्स भी इसी तरह की लापरवाही की भेंट चढ़ चुके हैं। वहां भी पहले निर्माण हुआ, फिर फाइलें चलीं, फिर समय बीता और अंत में इमारतें धीरे-धीरे जर्जर होने लगीं। लगता है नगर निगम ने इससे कोई सबक नहीं लिया—या शायद लिया हो, लेकिन उस सबक को लागू करना जरूरी नहीं समझा। स्थानीय नागरिकों का गुस्सा अब साफ नजर आने लगा है। उनका कहना है कि अगर यही हाल रहा तो जल्द ही ये दुकानें व्यापार की जगह चोरी और असामाजिक गतिविधियों का अड्डा बन जाएंगी। करोड़ों की संपत्ति यूं ही बेकार पड़ी रहेगी और फिर एक दिन प्रशासन कहेगा—“स्थिति बिगड़ गई है, अब सुधार की जरूरत है।” सवाल यह है कि जब सब कुछ समय रहते ठीक किया जा सकता है, तो इंतजार किस बात का है? वार्ड पार्षद रामगोपाल पाल ने इस मुद्दे को लेकर प्रशासन पर सीधा हमला बोला है। उनका कहना है कि उन्होंने कई बार नगर निगम परिषद की बैठकों में यह मामला उठाया, लेकिन हर बार आश्वासन मिला—और आश्वासन भी ऐसा जो फाइलों में ही दम तोड़ देता है। अब उन्होंने साफ चेतावनी दे दी है कि अगर जल्द ही नीलामी प्रक्रिया शुरू नहीं हुई, तो 16 तारीख को उग्र आंदोलन होगा पार्षद का कहना बिल्कुल सही है—जब 8.30 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, तो कम से कम उससे आमदनी भी शुरू होनी चाहिए। इन दुकानों की नीलामी से नगर निगम को एकमुश्त बड़ी राशि मिल सकती है, साथ ही मासिक किराया और अन्य शुल्कों के जरिए लगातार आय का स्रोत भी बनेगा। यह पैसा शहर के विकास, सड़क, नाली, लाइट जैसी बुनियादी सुविधाओं पर खर्च हो सकता है। लेकिन फिलहाल तो यह पूरा सिस्टम “कमाई” नहीं, बल्कि “कमजोरी” दिखा रहा है व्यापारियों की भी अपनी पीड़ा है। उनका कहना है कि ट्रांसपोर्ट नगर में यदि ये दुकानें चालू हो जाएं, तो उन्हें एक व्यवस्थित बाजार मिलेगा। छोटे और मध्यम व्यापारियों को जगह मिलेगी, रोजगार बढ़ेगा और पूरे क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियां तेज होंगी। लेकिन अभी स्थिति यह है कि व्यापारी इधर-उधर भटक रहे हैं और तैयार दुकानें ताले में बंद हैं—जैसे कोई मौका दरवाजे पर खड़ा हो और अंदर से कुंडी लगा दी गई हो यह भी कहा जा रहा है कि यह परियोजना मध्यप्रदेश शासन की योजना के तहत बनाई गई थी, जिसका उद्देश्य क्षेत्र का समग्र विकास करना था। लेकिन जिस गति से इसका संचालन हो रहा है, उसे देखकर लगता है कि “समग्र विकास” का मतलब सिर्फ “समग्र निर्माण” तक सीमित कर दिया गया है। आगे क्या होगा, यह शायद किसी को नहीं पता—या फिर पता है, लेकिन बताना कोई नहीं चाहता सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर जिम्मेदार कौन है? क्या यह फाइलों में उलझा मामला है, या इच्छाशक्ति की कमी है? या फिर यह वही पुरानी कहानी है जिसमें काम पूरा होने के बाद उसे चालू करना किसी की प्राथमिकता में नहीं रहता सिंगरौली की जनता अब जवाब चाहती है—क्योंकि यह सिर्फ 87 दुकानों का मामला नहीं है, बल्कि उस सिस्टम का आईना है जिसमें करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी नतीजा शून्य रहता है। अगर जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो यह कॉम्प्लेक्स विकास की मिसाल नहीं, बल्कि विफलता का प्रतीक बन जाएगा अब देखना दिलचस्प होगा कि नगर निगम प्रशासन नींद से जागता है या फिर यह “सोती हुई दुकानें” आने वाले समय में भी ऐसे ही खामोश खड़ी रहेंगी—और जनता सिर्फ सवाल पूछती रह जाएगी।













