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बड़ा खुलासा: गोरबी में “काले खेल” की काली पटकथा, और जिम्मेदारों की सफेद चुप्पी

बड़ा खुलासा: गोरबी में “काले खेल” की काली पटकथा, और जिम्मेदारों की सफेद चुप्पी

अनोखी कल्पना स्ट्रिंगर रिपोर्ट

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सिंगरौली के मोरवा थाना अंतर्गत गोरबी इलाका इन दिनों किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं लग रहा—बस फर्क इतना है कि यहां पर्दे पर नहीं, जमीन पर “काला खेल” चल रहा है। और इस खेल के किरदार भी कम दिलचस्प नहीं हैं—एक तरफ “खान और पाठक” की चर्चित जोड़ी, तो दूसरी तरफ जिम्मेदार विभागों की रहस्यमयी खामोशी। सवाल ये है कि आखिर ये खामोशी है या सहमति? स्थानीय सूत्रों की मानें तो गोरबी इलाके में इन दिनों कोयले की चोरी किसी छोटे-मोटे धंधे की तरह नहीं, बल्कि एक संगठित “इंडस्ट्री” के रूप में चल रही है। हजारों-करोड़ों का कोयला गायब हो रहा है, लेकिन जिम्मेदारों को जैसे “कुछ दिखता ही नहीं”। अब इसे संयोग कहें या सेटिंग? सबसे दिलचस्प पहलू है “गोरबी चौकी” का। स्थानीय लोगों का कहना है कि चौकी प्रभारी शायद किसी गहरी नींद में हैं—इतनी गहरी कि आसपास हो रहे इस बड़े खेल की भनक तक नहीं लग रही। या फिर यह भी हो सकता है कि आंखें खुली हों, लेकिन देखने का मन न हो। क्योंकि जब चोरी खुलेआम हो, स्टॉक जगह-जगह जमा हो, और फिर भी कार्रवाई न हो—तो सवाल उठना लाजमी है सूत्र बताते हैं कि कई स्थानों पर बड़े पैमाने पर कोयले का स्टॉक रखा गया है इसकी जानकारी पुलिस तक पहुंचाई भी गई, लेकिन “कार्रवाई” नाम की चिड़िया अब तक दिखाई नहीं दी। अब या तो सूचना गलत है—जो कि कई बार दोहराई जा चुकी है—या फिर कार्रवाई न करने के पीछे कोई “बड़ा कारण” है, जो आम जनता को नहीं पता जब हमारी टीम ने इस पूरे मामले में CIL/NCL के कर्मचारियों से बात की, तो उनका जवाब भी कम चौंकाने वाला नहीं था। उन्होंने साफ शब्दों में कहा—“ये पुलिस का काम है।” यानी जिम्मेदारी का पिंग-पोंग खेल शुरू हो चुका है। पुलिस कहेगी—“जांच करेंगे”, NCL कहेगा—“हमारा काम नहीं”, और इस बीच कोयला अपनी राह पकड़ लेगा

अब सवाल ये उठता है कि आखिर करोड़ों का नुकसान किसके खाते में जाएगा? कागजों में ये घाटा किसके सिर फूटेगा? या फिर हमेशा की तरह यह भी “एडजस्ट” हो जाएगा? गोरबी में ये कोई पहला मामला नहीं है इससे पहले भी बड़े स्तर पर कोयले के अवैध स्टॉक पकड़े जा चुके हैं, रेड भी हुई है, लेकिन उसके बाद क्या हुआ—ये सवाल आज भी हवा में तैर रहा है। कुछ दिन शोर, फिर सन्नाटा—और फिर वही खेल दोबारा शुरू स्थानीय लोगों का कहना है कि रात के अंधेरे में लाठी-डंडों और कट्टों के दम पर कोयले की चोरी हो रही है यानी ये सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था के लिए भी सीधी चुनौती है लेकिन जब चुनौती देने वाले बेखौफ हों और रोकने वाले खामोश—तो नतीजा क्या होगा, ये बताने की जरूरत नहीं

सबसे चिंताजनक पहलू है “मिलीभगत” की आशंका जब बार-बार सूचना देने के बावजूद कार्रवाई नहीं होती, जब खुलेआम स्टॉक पड़ा रहता है, जब चोरी की खबरें दब जाती हैं—तो यह मान लेना मुश्किल हो जाता है कि सब कुछ सामान्य है “चोर-चोर मौसेरे भाई” वाली कहावत यहां कुछ ज्यादा ही सटीक बैठती नजर आ रही है

और अगर वाकई “खान और पाठक” की जोड़ी इस पूरे खेल की धुरी है, तो सवाल और भी बड़ा हो जाता है—क्या इनके खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत किसी में है? या फिर ये नाम सिर्फ फुसफुसाहट तक ही सीमित रह जाएंगे?

इस पूरे मामले में मीडिया की भूमिका भी सवालों के घेरे में है शुरुआत में कुछ पत्रकारों ने इस मुद्दे को उठाया, खबरें चलाईं, लेकिन अचानक सब कुछ शांत हो गया क्या दबाव था? क्या समझौता हुआ? या फिर “मैनेजमेंट” का खेल यहां भी चल गया? अगर ऐसा है, तो यह पत्रकारिता के लिए भी गंभीर आत्ममंथन का विषय है

व्यंग्य की बात करें तो गोरबी का हाल कुछ ऐसा हो गया है जैसे सबको सब पता है, लेकिन कोई कुछ बोलना नहीं चाहता पुलिस कहती है—“देखेंगे”, अधिकारी कहते हैं—“करवाएंगे”, और जनता कहती है—“हो क्या रहा है?”

कोयले का यह “काला कारोबार” अब सिर्फ आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक निष्क्रियता और जवाबदेही की कमी का प्रतीक बन चुका है। चौकी की “चमक” कागजों में भले ही बरकरार हो, लेकिन जमीन पर वह काली पड़ती नजर आ रही है

अब सबसे बड़ा सवाल—क्या इस पर कोई ठोस कार्रवाई होगी? या फिर यह खबर भी कुछ दिनों में पुरानी फाइल बनकर रह जाएगी?

अगर जिम्मेदारों में जरा भी दम है, तो अब वक्त है कार्रवाई का वरना गोरबी की यह कहानी आने वाले समय में और भी “काली” होती जाएगी—और तब सिर्फ सवाल ही नहीं, जवाब भी ढूंढना मुश्किल हो जाएगा

आखिर में बस इतना ही—झूठी पीठ थपथपाने से न तो चोरी रुकेगी, न ही सिस्टम सुधरेगा।

जरूरत है सच्चाई को स्वीकार करने की और उस पर सख्त कदम उठाने की। वरना गोरबी का “काला सच” यूं ही धुआं बनकर उड़ता रहेगा, और जिम्मेदार लोग आंखों पर पट्टी बांधे तमाशा देखते रहेंगे

Author

  • अजय शर्मा | प्रधान संपादक


    ✔ भारत सरकार से मान्यता प्राप्त वरिष्ठ पत्रकार
    RNI / PRGI / MPHIN/26/A0617

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