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सरकारी अफसर एनटीपीसी के मेहमान “राखड़ से सड़कें दहशत में धुएं से आसमान काला— जनता घुट रही, अफसर मौज में”

सरकारी अफसर एनटीपीसी के मेहमान “राखड़ से सड़कें दहशत में धुएं से आसमान काला— जनता घुट रही, अफसर मौज में”

सच दबाने का खेल: एनटीपीसी का सिस्टम सवालों के कटघरे मे

सिंगरौली: देश की प्रतिष्ठित ऊर्जा कंपनी एनटीपीसी का विंध्याचल प्रोजेक्ट इन दिनों गंभीर आरोपों के साए में है आरोप इतने संगीन हैं कि अगर इनकी निष्पक्ष जांच हो जाए, तो कई बड़े चेहरे बेनकाब हो सकते हैं। यहां हालात ऐसे बन चुके हैं मानो नियम-कानून सिर्फ किताबों तक सीमित हों और जमीनी स्तर पर “जो मन में आए वही करो” की नीति चल रही हो स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि एनटीपीसी प्रबंधन खुलेआम मनमानी कर रहा है—धूल-डस्ट प्रदूषण से लेकर जहरीले धुएं तक, हर समस्या लोगों की जिंदगी को प्रभावित कर रही है। गांवों और बस्तियों में सांस लेना तक मुश्किल हो गया है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी एसी कमरों में बैठकर सबकुछ “नॉर्मल” बताने में जुटे हैं।
राखड़ परिवहन बना मौत का खेल
सड़कों पर दौड़ते राखड़ से भरे भारी वाहन किसी हादसे का इंतजार कर रहे हैं। नियमों का पालन न के बराबर है—ना ढंग से ढंकाव, ना स्पीड कंट्रोल। आम जनता की जान जोखिम में डालकर ट्रांसपोर्टर खुलेआम तांडव कर रहे हैं, और एनटीपीसी प्रबंधन चुप्पी साधे बैठा है। सवाल उठता है—क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही नींद टूटेगी?

प्रदूषण पर लीपापोती, सच पर पर्दा

चिमनियों से निकलता धुआं, हवा में घुलता जहर, और हर तरफ उड़ती राख—ये सब किसी से छुपा नहीं है। लेकिन कागजों में सब “कंट्रोल” दिखाया जाता है पर्यावरणीय नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ रही हैं, और जिम्मेदार विभाग आंखें मूंदे हुए हैं। क्या यह मिलीभगत नहीं तो और क्या है?

पीआरओ पर गंभीर आरोप—‘सच को झूठ, झूठ को सच’

सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में एनटीपीसी का जनसंपर्क तंत्र है। आरोप है कि पीआरओ शंकर सुप्रमणियम तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने में माहिर हो चुके हैं पत्रकारों का कहना है: प्रेस कॉन्फ्रेंस में पारदर्शिता शून्य

जानकारी सिर्फ “चुनिंदा लोगों” तक सीमित

फोन कॉल्स का कोई जवाब नहीं
सवाल पूछने वालों को नजरअंदाज
ऐसे में यह संदेह और गहराता है कि कहीं सच्चाई को दबाने के लिए “मैनेजमेंट गेम” तो नहीं खेला जा रहा?

शिकायतें पहुंचीं दिल्ली तक—अब भी खामोशी क्यों?

पूरा मामला अब सिर्फ सिंगरौली तक सीमित नहीं रहा प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रपति कार्यालय और एनटीपीसी के केंद्रीय दफ्तर (दिल्ली) तक शिकायतें भेजी जा चुकी हैं श्रमजीवी पत्रिका जन कल्याण परिषद अध्यक्ष संजय रैकवार ने इस पूरे मामले को गंभीरता से उठाया हैं और कार्यवाही की मांग किया हैं

मांग साफ है—
दोषियों पर कड़ी कार्रवाई”संदिग्ध अधिकारियों का तबादला”पूरे सिस्टम की निष्पक्ष जांच”लेकिन सवाल यह है कि इतने बड़े स्तर पर शिकायत पहुंचने के बावजूद अब तक कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाया गया? प्रशासन-एनटीपीसी गठजोड़? उठ रहे बड़े सवाल मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि जिन अधिकारियों को एनटीपीसी पर निगरानी रखनी चाहिए, वही उसके “सुविधा उपभोक्ता” बन बैठे हैं।
बताया जा रहा है कि—करीब 80% पुलिस और प्रशासनिक अमला एनटीपीसी के आवासों में रह रहा है शासकीय आवास होने के बावजूद निजी कंपनी की सुविधाओं का उपयोग वरिष्ठ अधिकारियों तक इस दायरे में शामिल

अब सवाल उठता है—
जब रहने-खाने की व्यवस्था एनटीपीसी के भरोसे होगी, तो कार्रवाई की निष्पक्षता कैसे सुनिश्चित होगी?

कलेक्टर की अलग राह—एक उम्मीद की किरण

इस पूरे माहौल में एक नाम अलग नजर आता है—कलेक्टर गौरव बैनल उन्होंने एनटीपीसी आवास को ठुकराकर शासकीय आवास को प्राथमिकता दी, जो यह दिखाता है कि सिस्टम में अभी भी ईमानदारी जिंदा है लेकिन अकेला चना कब तक भाड़ फोड़ेगा? मीडिया मैनेजमेंट या सच का गला घोंटना? आरोप यह भी हैं कि कुछ चुनिंदा पत्रकारों को सुविधाएं देकर “मैनेज” किया जा रहा है, ताकि आवाजें दबाई जा सकें अगर यह सच है, तो यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सीधा हमला है।
सीसीएल आवासों में भी वही कहानी
केवल एनटीपीसी ही नहीं, बल्कि सीसीएल आवासों में भी प्रशासनिक कब्जे की बात सामने आ रही है लगभग 20% अधिकारी वहां भी जमे हुए हैं, जिससे पूरा सिस्टम “सुविधा आधारित” होता जा रहा है

अब जनता पूछ रही है—जवाब कौन देगा? क्या मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव इस मामले में हस्तक्षेप करेंगे?
क्या डीजीपी और मुख्य सचिव जांच के आदेश देंगे? क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी या फाइलें धूल खाती रहेंगी? सिंगरौली की जनता अब चुप नहीं बैठने वाली प्रदूषण, भ्रष्टाचार और सिस्टम की इस मिलीभगत के खिलाफ आवाज बुलंद हो चुकी है।
अब देखना यह है कि शासन-प्रशासन इस “आग” को बुझाता है या फिर यह चिंगारी एक बड़े आंदोलन में बदल जाती है।
(जारी… अगली कड़ी में और खुलासे संभव)

Author

  • अजय शर्मा | प्रधान संपादक


    ✔ भारत सरकार से मान्यता प्राप्त वरिष्ठ पत्रकार
    RNI / PRGI / MPHIN/26/A0617

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