पुलिस ट्रांसफर नीति और सुप्रीम कोर्ट गाइडलाइन के बावजूद ‘स्थायी पोस्टिंग’ पर बवाल
पुलिस ट्रांसफर नीति और सुप्रीम कोर्ट गाइडलाइन के बावजूद ‘स्थायी पोस्टिंग’ पर बवाल

मध्य प्रदेश का सिंगरौली जिला एक बार फिर कानून व्यवस्था को लेकर चर्चाओं में है सवाल इसलिए क्योंकि यह प्रदेश का शायद इकलौता ऐसा जिला बनता जा रहा है, जहां नियमों के विपरीत कार्य खुलेआम होते नजर आ रहे हैं यदि जिले के प्रशासनिक और पुलिस व्यवस्था की स्थिति पर गौर किया जाए, तो चौंकाने वाली तस्वीर सामने आती है। यहां कई पुलिसकर्मी ऐसे हैं जो लगभग 20 से 25 वर्षों या उससे भी अधिक समय से सिंगरौली जिले में ही पदस्थ हैं अब सीधा सवाल—क्या नियम में ऐसा कोई प्रावधान है कि एक पुलिसकर्मी एक ही जिले में 20 साल या उससे अधिक समय तक लगातार अपनी सेवाएं दे सकता है? मामला यहीं खत्म नहीं होता। आरोप यह भी है कि जैसे ही कोई नया थाना प्रभारी या चौकी प्रभारी पदभार ग्रहण करता है, वह अपने जाति वर्ग विशेष और करीबी पुलिसकर्मियों को अपने थाने या चौकी में तैनात करवा लेता है यानी थाने अब कानून के हिसाब से नहीं, बल्कि “अपने लोगों” के हिसाब से चलाए जा रहे हैं—ऐसा गंभीर आरोप सामने आ रहा है सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि पुलिसिंग व्यवस्था के तहत ट्रांसफर किए जाते हैं, तो फिर एक ही समुदाय से जुड़े सैकड़ों पुलिसकर्मियों की नियुक्ति एक ही थाने या चौकी में क्यों की जा रही है? और इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात—ऐसे पुलिसकर्मी जिनका नाम विभागीय जांच में शामिल है या 4 साल से अधिक समय से सूची में दर्ज है, उन्हें भी एक ही स्थान पर लगातार पदस्थ क्यों रखा जा रहा है?
अब सवाल उठता है—ऐसी पोस्टिंग करता कौन है?
स्वाभाविक रूप से यह अधिकार जिले के पुलिस कप्तान यानी एसपी के पास होता है, जिनके आदेश पर ही थाना और चौकियों में तैनाती होती है तो क्या एसपी को इस पूरी स्थिति की जानकारी नहीं है? या फिर सब कुछ जानते हुए भी नियमों के विपरीत कार्य करने के लिए मजबूरी है? क्या इसके पीछे किसी बड़े मंत्री या राजनीतिक दबाव का हाथ है? या फिर कोई और बड़ा खेल चल रहा है?
अगर इस पूरे मामले को प्रत्यक्ष रूप से देखना हो, तो मुख्यालय के आसपास के क्षेत्र—कोतवाली, विंध्यनगर, नवानगर, शान चौकी और खुटार पुलिस चौकी का जायजा ले लिया जाए, तस्वीर साफ नजर आ जाएगी यहां स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि थाना प्रभारी और चौकी प्रभारी के आसपास एक ही वर्ग विशेष या उनके करीबी पुलिसकर्मी 24×7 तैनात रहते हैं हालांकि यह स्थिति सिर्फ मुख्यालय तक सीमित नहीं है, बल्कि जिले के लगभग सभी थाना और पुलिस चौकियों में इसी प्रकार की व्यवस्था देखने को मिल रही है।
अब बड़ा सवाल जनप्रतिनिधियों पर भी खड़ा होता है— वे इस पूरे मामले में खामोश क्यों हैं?
अब तक कोई ठोस शिकायत भोपाल सचिवालय या मंत्रालय स्तर तक क्यों नहीं भेजी गई? क्या कार्रवाई की मांग इसलिए नहीं उठ रही क्योंकि कहीं न कहीं स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भी भूमिका इस पूरे मामले में शामिल है?
सिंगरौली की जनता अब जवाब चाहती है—
क्या यहां कानून का राज चलेगा या फिर “मनमानी पोस्टिंग और जातीय समीकरण” ही व्यवस्था तय करेंगे? फिलहाल यह तो सिर्फ शुरुआत है… आगे इस पूरे मामले में और बड़े खुलासे होने बाकी हैं
जिम्मेदारी किसकी?
जिला पुलिस अधीक्षक (SP): नियुक्ति और ट्रांसफर का अंतिम अधिकार
राजनीतिक हस्तक्षेप?: क्या ऊपर से दबाव में फैसले जनप्रतिनिधि: आखिर चुप्पी क्यों?
विभागीय जांच वाले कर्मियों की पोस्टिंग:
जिन अधिकारियों/कर्मचारियों पर जांच लंबित हो, उन्हें आमतौर पर संवेदनशील पदों से दूर रखा जाता है सवाल: फिर ऐसे नाम बार-बार एक ही जगह क्यों दिखते हैं?
सुप्रीम कोर्ट गाइडलाइन : प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार केस, 2006
थाना प्रभारी (SHO) और अन्य अधिकारियों का कम से कम 2 साल का निश्चित कार्यकाल होना चाहिए लेकिन इसका मतलब “अनिश्चितकालीन पोस्टिंग” नहीं, बल्कि स्थिरता के साथ रोटेशन है
पर इस गाइडलाइन को “स्थायी कब्जा” समझ लिया गया है?
ट्रांसफर पॉलिसी : मध्य प्रदेश शासन
सामान्यतः किसी भी शासकीय कर्मचारी का एक ही स्थान पर 3 से 5 वर्ष से अधिक रुकना उचित नहीं माना जाता
संवेदनशील पदो (जैसे थाना/चौकी) पर यह अवधि और भी कम रखी जाती है
फिर सिंगरौली में 20-25 साल से जमे पुलिसकर्मी किस नियम के तहत टिके हुए हैं?













