लंघाढोल क्षेत्र में कोयला परिवहन बना जानलेवा—हर घंटे 50-60 भारी वाहन, जर्जर सड़क, बढ़ते हादसे सिंगरौली की जनता पूछ रही है— क्या हमारी जान की कोई कीमत है या नहीं?
लंघाढोल क्षेत्र में कोयला परिवहन बना जानलेवा—हर घंटे 50-60 भारी वाहन, जर्जर सड़क, बढ़ते हादसे; कार्रवाई के बजाय खामोश प्रशासन पर उठे सवाल

सिंगरौली : अजय शर्मा
आइए देखिए आदरणीय मध्यप्रदेश के डीजीपी कैलाश मकवाना जी—सिंगरौली जिले के लंघाढोल थाना क्षेत्र में आखिर चल क्या रहा है? यहां कार्य कर रही अडानी APMDC कंपनी की मनमानी ने आम जनता की ज़िंदगी को खतरे में डाल दिया है। प्रतिदिन, हर घंटे 50 से 60 भारी वाहन—कोयले से लोड और अनलोड हाईवा व ट्रेलर—उसी सड़क से गुजर रहे हैं, जो आम जनता के आवागमन का एकमात्र साधन है सड़क की स्थिति ऐसी है कि मानो मौत का रास्ता बन चुकी हो—पूरी तरह जर्जर, टूटी हुई, धूल और गड्ढों से भरी। लेकिन सवाल ये है कि जब सड़क चलने लायक नहीं है, तो आखिर इन भारी वाहनों को खुलेआम दौड़ाने की अनुमति किसने दी? क्या प्रशासन आंख मूंद कर बैठा है या फिर सब कुछ मिलीभगत से चल रहा है स्थानीय लोगों का कहना है कि यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि “सुनियोजित खतरा” है। भारी वाहन बेखौफ सड़कों पर दौड़ते हैं, लोगों को रौंदते हुए गुजरते हैं और इसे ही विकास का नाम दिया जा रहा है। दुर्घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं अभी महज 3 दिन पहले एक दर्दनाक हादसा हुआ—एक हाईवा के नीचे मोटरसाइकिल सवार तीन लोग दब गए और मौके पर ही उनकी मौत हो गई। आखिरकार इन मौतों का जिम्मेदार कौन है क्या थाना प्रभारी की नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह अपने क्षेत्र में बढ़ती दुर्घटनाओं पर लगाम लगाए? क्या उनका कर्तव्य नहीं कि ऐसे भारी वाहनों की आवाजाही को नियंत्रित करें, विशेषकर तब जब सड़क की हालत इतनी खराब हो? या फिर उन्हें खुली छूट दे दी गई है कि “जो करना है करो, कोई पूछने वाला नहीं स्थानीय लोगों के बीच यह भी चर्चा है कि यदि कोई आवाज उठाता है, तो उस पर फर्जी मुकदमे लाद दिए जाते हैं, जेल भेज दिया जाता है। अगर कोई सड़क पर उतरकर विरोध करता है, तो उस पर सख्ती दिखाई जाती है। क्या यही कानून व्यवस्था है? क्या यही लोकतंत्र है? क्या आदिवासी और गरीब वर्ग की आवाज को दबाना ही प्रशासन की नीति बन चुकी है?
अब सीधे सवाल—जवाब किसके पास?
यह मामला अब सिर्फ एक सड़क या एक थाना क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा कर रहा है मध्यप्रदेश के डीजीपी कैलाश मकवाना जी—क्या आपको सिंगरौली की यह जमीनी हकीकत दिखाई नहीं दे रही? क्या कानून व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित रह गई है? सिंगरौली जिले के एसपी—आपके जिले में रोजाना इस तरह मौत के मुंह में लोग जा रहे हैं, क्या यह आपकी प्राथमिकता में नहीं आता? दुर्घटनाओं को रोकना, ट्रैफिक नियंत्रण करना, क्या पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है सिंगरौली कलेक्टर—जिले के मुखिया होने के नाते क्या यह आपकी जिम्मेदारी नहीं बनती कि सड़कों की हालत सुधारी जाए, भारी वाहनों के लिए वैकल्पिक मार्ग तैयार किए जाएं और जनता की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए? संबंधित विभाग—पीडब्ल्यूडी, परिवहन विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड—क्या ये सभी विभाग केवल कागजों पर ही सक्रिय हैं?
कानून क्या कहता है और यहां क्या हो रहा है?
👉 मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के अनुसार, ओवरलोडिंग और असुरक्षित परिवहन दंडनीय अपराध है 👉 सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों में साफ कहा गया है कि सार्वजनिक सड़कों पर भारी वाहनों की अनियंत्रित आवाजाही को रोका जाए 👉 हाई कोर्ट के कई फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि यदि सड़क की स्थिति खराब है, तो वहां भारी वाहनों के संचालन पर रोक लगाई जा सकती है 👉 नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने कोयला परिवहन के दौरान धूल नियंत्रण और पर्यावरण सुरक्षा के कड़े निर्देश दिए हैं लेकिन सिंगरौली में— नियम सिर्फ कागजों तक सीमित हैं, जमीनी स्तर पर उनकी खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं जमीनी सच्चाई: डर, धूल और मौत का साया ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, लंघाढोल क्षेत्र में हालात बेहद चिंताजनक हैं सड़कें पूरी तरह गड्ढों में तब्दील हो चुकी हैं हर घंटे दर्जनों भारी वाहन गुजरते हैं धूल और कोयले के कणों से हवा जहरीली हो चुकी है स्कूल जाने वाले बच्चों और बुजुर्गों के लिए सड़क पार करना जानलेवा बन गया है गांवों के लोग बताते हैं कि दिन हो या रात, हर समय मौत का डर बना रहता है। रात के समय तेज रफ्तार हाईवा बिना किसी नियम के दौड़ते हैं, जिससे हादसों की आशंका और बढ़ जाती है प्रशासनिक निष्क्रियता या संरक्षण सबसे गंभीर आरोप यह है कि यदि कोई व्यक्ति इन हालात के खिलाफ आवाज उठाता है, तो उसे दबाने की कोशिश की जाती है फर्जी मुकदमे दर्ज करने के आरोप विरोध करने वालों पर दबाव आदिवासी समुदाय के साथ कथित अन्याय यदि ये आरोप सही हैं, तो यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक संकेत है जनता में उबाल—आंदोलन की चेतावनी लगातार बढ़ती घटनाओं ने लोगों के धैर्य को तोड़ दिया है।
अब लोग खुलकर कह रहे हैं कि—
अगर प्रशासन नहीं जागा, तो जनता खुद सड़क पर उतरेगी स्थानीय संगठनों और युवाओं ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो बड़ा आंदोलन किया जाएगा
अब क्या होना चाहिए? (जनता की मांग)
👉 भारी वाहनों के लिए अलग बाईपास रोड का निर्माण 👉 जर्जर सड़कों की तत्काल मरम्मत 👉 ओवरलोडिंग पर सख्त कार्रवाई 👉 जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो 👉 पीड़ित परिवारों को मुआवजा और न्याय
अंतिम सवाल—चुप्पी कब तक?
अगर यही हाल रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब हालात बेकाबू हो जाएंगे और जब जनता सड़कों पर उतरती है, तो जिम्मेदारी तय करनी ही पड़ती है यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि चेतावनी है— प्रशासन के लिए, सरकार के लिए, और उन सभी जिम्मेदारों के लिए जो आज खामोश हैं
सिंगरौली की जनता पूछ रही है— क्या हमारी जान की कोई कीमत है या नहीं?













