नाम-चेहरा गायब, फुटेज लापता—थाने के सामने हुई वारदात में किसने दबा दी सच्चाई?
सीसीटीवी, बंदूक और ट्रैक्टर—सबूतों के बाद भी सन्नाटा, सिंगरौली जिला में कानून क्यों हुआ बेअसर?

सबूत थे, फिर भी सन्नाटा क्यों?
घटना-स्थल पर सीसीटीवी कैमरे मौजूद थे। फुटेज सुरक्षित होनी चाहिए थी। लेकिन तस्वीरें अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं हुईं? अगर कैमरों की “आँखें” थीं, तो सच का चेहरा क्यों गायब है? क्या सबूतों पर समय रहते हाथ नहीं डाला गया, या फिर हाथ डालने से रोका गया?
बंदूक की नोक पर लूट, फिर भी कार्रवाई ‘नज़ायब’
सूत्र बताते हैं कि रेत माफिया ने खुलेआम बंदूक दिखाकर रेत लूटी और ट्रैक्टर उड़ा ले गया। यह कोई छुपी-छिपी वारदात नहीं थी—यह खुली चुनौती थी। इसके बावजूद न तो सख़्त गिरफ्तारी, न ही ट्रैक्टर की बरामदगी, न ही हथियार की जब्ती। आखिर क्यों?
‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ का इलाका, खौफ कम क्यों?
जिस क्षेत्र को कभी अपराधियों के लिए सख़्त माना जाता रहा, वहीं माफिया सिर उठाकर भागे—यह व्यवस्था पर सीधा प्रश्न है। ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ कहलाने का भी एक उसूल होता है; जब हथियार ही न दिखें, तो रुतबा भी धूल होता है। खौफ का असर अगर कम पड़ गया है, तो जिम्मेदारी किसकी?
थाना प्रभारी के इलाके में सवालों की कतार
सुदेश तिवारी के थाना क्षेत्र में यह घटना हुई—यह तथ्य खुद में जवाब मांगता है। माफिया कैसे भागा? किसकी लापरवाही से? क्या दबाव, संरक्षण या सिस्टम की सुस्ती ने रास्ता दिया?
जनता पूछ रही है—जवाब कब?
माफिया का नाम और पहचान सार्वजनिक क्यों नहीं?
सीसीटीवी फुटेज अब तक क्यों नहीं आई?
ट्रैक्टर और हथियार की बरामदगी कब?
जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई क्यों नहीं?
यह मामला सिर्फ एक ट्रैक्टर या रेत का नहीं—यह कानून की साख का है। जब थाने के सामने से अपराधी भागे और कानून हैरान रह जाए, तो लोकतंत्र में सवाल उठना लाज़मी है। सिंगरौली की जनता जवाब चाहती है—और जवाब भी












