परिषद से फाइल गायब क्यों? प्लॉट आवंटन में बड़ा खेल प्लॉट आवंटन बना सियासी बम
टेंडर के नाम पर प्लॉट सेटिंग? सिंगरौली निगम में पारदर्शिता की धज्जियां

सिंगरौली। नगर निगम में प्लॉट आवंटन को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। बजट परिषद की बैठक में पार्षद रामगोपाल पाल द्वारा उठाए गए सवालों के बाद अब मामला गरमा गया है। खास बात यह रही कि जिस फाइल को परिषद में पेश किया जाना चाहिए था, वह मंगाई ही नहीं गई, जिससे संदेह और गहरा हो गया है परिषद में आमतौर पर छोटे-बड़े कई मामलों की फाइलें मंगाकर अध्यक्ष द्वारा पार्षदों को जानकारी दी जाती है, लेकिन इस बार जब मामला कथित रूप से विधायक से जुड़ा बताया जा रहा है, तो पूरे मामले में असामान्य चुप्पी देखने को मिली। इससे पार्षदों और स्थानीय लोगों के बीच कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि नगर निगम, जो पिछले 13 वर्षों से “कोई प्लॉट उपलब्ध नहीं” होने की बात कहता रहा, अचानक एक प्लॉट कैसे उपलब्ध हो गया? और यदि हुआ, तो उसका आवंटन किन नियमों और प्रक्रियाओं के तहत किया गया? सूत्रों के मुताबिक, इस प्लॉट आवंटन में न तो एमआईसी (MIC) की अनुमति ली गई और न ही पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई गई। आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि “टेंडर सेटलमेंट” के नाम पर कथित रूप से प्लॉट का आवंटन किया गया, जिससे पूरे मामले की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो गए हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है मामले में नगर निगम कमिश्नर की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। पार्षदों का कहना है कि जब इस संबंध में जवाब मांगा गया तो स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। कुछ का यह भी आरोप है कि संपर्क करने पर जवाब नहीं मिल रहा, जिससे पारदर्शिता को लेकर और शंका बढ़ रही है यह पूरा मामला अब नगर निगम की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिन्ह बनकर खड़ा हो गया है। यदि आरोपों में सच्चाई है, तो यह न केवल नियमों का उल्लंघन है बल्कि जनता के विश्वास के साथ भी गंभीर खिलवाड़ है मामले ने अब राजनीतिक रंग भी पकड़ लिया है। विपक्षी पार्षदों के साथ-साथ कुछ सत्तापक्ष के जनप्रतिनिधि भी अंदरखाने इस मुद्दे को लेकर नाराज बताए जा रहे हैं। परिषद के भीतर और बाहर इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि क्या नियमों को दरकिनार कर किसी खास को फायदा पहुंचाया गया?
फाइल गायब या जानबूझकर दबाई गई?
यह सवाल अब सबसे ज्यादा चर्चा में है। यदि फाइल मौजूद है तो उसे परिषद में क्यों नहीं लाया गया? और यदि नहीं है, तो आखिर इतनी बड़ी प्रक्रिया बिना दस्तावेजों के कैसे पूरी हो गई?
जनता के बीच भी उठने लगे सवाल
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब आम नागरिकों को सालों तक प्लॉट के लिए इंतजार करना पड़ता है, तो फिर अचानक “विशेष मामलों” में नियम कैसे बदल जाते हैं? इससे नगर निगम की निष्पक्षता और कार्यशैली पर सीधा असर पड़ रहा है अब निगाहें प्रशासन पर अब देखना यह होगा कि क्या नगर निगम प्रशासन इस मामले में पूरी फाइल सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करता है, या फिर यह मामला भी सवालों के घेरे में ही उलझा रह जाएगा। अगर जल्द ही स्पष्ट जवाब नहीं मिला, तो यह विवाद और बड़ा रूप ले सकता है और जिम्मेदार अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय होना तय माना जा रहा है।













